Thursday, 7 September 2017

अगर आप कहते हैं कि देश में महंगाई बढ़ी है, तो यकिन मानीये जनाब आप मुगालते में जी रहे हैं जनाब जरा बाहर निकल कर देखिए सियासत कितनी सस्ती हो गयी है.





मे रा यकिन मानीये मैं सच कह रहा हूं, और मैं किसी पूर्वाग्रह या किसी विचारधारा से ग्रसित नहीं हूं वरना मेंरे उपर भी वामपंथी और दक्षिणपंथी पत्रकार का ठप्पा लग जायेगा. पर जो देखता हूं वहीं महसूस करता हूं वही बता रहा हू, और सच यह है कि सरकार इतनी मजबूत है कि उसे गुमान हो गया हैं, विपक्ष इतना कमजोर हो गया है कि सड़क पर बैठकर ला‌उडस्पीकर के सहारे गलाफाड़ कर चिल्ला रहा है, पर उसकी आवाज वाहनों के शोर में दब जा रही है.

मै सरकार की आलोचना नहीं कर रहा हूं, क्योंकि ऐसा भी नहीं है कि सरकार बिलकुल निकम्मी है, पर जहां काम होना चाहिए वो नहीं हो रहा है, और जरुरत से ज्यादा वाह वाही लूटी जा रही है. जमशेदपुर के एमजीएम अस्पताल में जितनी बच्चों की मौत हुई सभी की मौत कुपोषण से हुई, यह मै नहीं मीडिया रिपोर्टस में कहा गया, जांच टीम ने यह  बात कही, साहब अगर कुपोषण से 
बच्चों की मौत हो रही है तो फिर आंगनबाड़ी में बच्चों को मिल रहे पोषाहार कौन गटक रहा है लगे हाथ इसकी भी जांच पंद्रह दिनों के अंदर करा दिजीये, और अगर इस मामले में विपक्ष हल्ला कर रहा है तो क्या गलत कर रहा है साहब, किसी की आवाज तो आप तक पंहुचे क्योंकि आपके कान में तो सिर्फ प्रचार वाहन का शोर सुनाई देता है जो राज्य भर में घूम-घूम अापका गुनगाण कर रहे हैं और जनता इसी से खुश है. भले मरीज को अस्पताल जाने के लिए एंबुलेंस नहीं मिले पर प्रचार के वाहन होना जरुरी है, क्योंकि सियासत भले ही सस्ता हो गया है साधने का तरीका तो महंगा है ना. इन दिनों गुमला जिला अखबारों में बहुत पढ़ा जा रहा है क्योंकि वहां अस्पताल में इंसानियत बेमौत मारा जा रहा है. समझ में नहीं आता है कि आखिर मौत पर मौत हो रही है पर गलती क्या है कोई नहीं पकड़ पा रहा है, सारे इंजीनियर डॉक्टर फेल हैं. क्यों फेल है नहीं पता, आप अंदाजा लगा लीजिये. 

साहब आलम यह है कि गला फाड़ के गरीब गरीब कहने वाले अमीर पर अमीर हो रहे हैं, और बेचारा गरीब आज भी पेट भरने से आगे सोच नहीं पा रहा है. यह मत सोचियेगा वामपंथी हो गया हूं, गांव की सच्चाई देख कर बता रहा हूं. गरीबों के लिए बनी योजनाएं धूल फांक रही है, और गरीब भी धूल फांक रहा है. जो चावल मिलता है आधा चूहे खा जाते है और पीडीएस वाले खा जाते हैं. साहब गांवों में जब आप जाते हैं तो सबसे आखिर में खड़े व्यक्ति से सवाल क्यों नहीं पूछते हैं कि समस्या क्या है. 

क्यों सिर्फ आगे पीछे घुमने वाले वार्ड सदस्य मुखिया अधिकारी और चमचों से पूछते है कि क्या हाल, क्यों बताते है कि फलाने के घर में जाना है, गांव आपका है जाकर घुस जाइये किसी भी गरीब के घर में सच्चाई से सामना हो जाएगा. आज जो हालात है उसे लेकर मै सवाल कर रहा हूं, मैं किसी को जिम्मेदार नहीं ठहरा रहा हूं, गलती किसकी है, मैं इस पर नहीं जा रहा हूं, पर दशकों से वही गलती क्यों दोहरायी जा रही है. सच में सियासत सस्ती हो गयी है, तभी तो बार-बार जनता को धोखा दिया जा रहा है.  सियासत वाले सियासत करते नहीं थक रहे हैं, गरीब और किसान मेनहत करते नहीं थक रहा है काम सब कर रहें हैं फिर भी रोना उसी बात का है.    

Wednesday, 6 September 2017

एक बार ठहर जाओं रुक जाओं थोड़ा आराम से सोच लो मेरे बारे में की तुम्हारे उर्जा की भूख और विकास की दौड़ ने मुझे बंजर बना दिया है, मै धरती मां हूं मां मुझे मां ही रहने दो, अपनी जरुरतों के लिए मुझे बांझ मत बनाओं


ज सुबह एक वीडियो देखा जिसमे जल संरक्षण को लेकर एक दूरदर्शी सोच दिखायी गयी थी साथ ही बताया गया था कि अगर वक्त रहे हम नहीं चेते तो हमारी आने वाली पीढ़ी को गला तर करने भर भी पानी नसीब नहीं होगा. वीडियों ने अंदर तक झकझोर दिया कि क्या वाकई विकास की दौड़ में हम इतने अंधे हो गये है कि विनाश नहीं दिख रहा है या हम विनाश को देखना नहीं चाह रहे है. दूसरी वाली बात मौजूदा दौर में सत्य लगती है क्योंकि हम इंसान अब कम से कम इतने समझदार जरुर हो गये है कि विनाश का आकलन नहीं कर पाये या जो हमे बार बार दिखाने का प्रयास किया जा रहा है वो नहीं देखे.
उ र्जा की भूख ने हमे इतना भूखा कर दिया है कि हम उसीके पीछे भाग रहे हैं और प्रकृति हमसे बार- बार कह रही है की एक बार ठहर  जाओं रुक जाओं थोड़ा आराम से सोच लो मेरे बारे में की तुम्हारे उर्जा की भूख और विकास की दौड़ ने मुझे बंजर बना दिया है, मै धरती मां हूं मां मुझे मां ही रहने दो, अपनी जरुुरतों के लिए मुझे बांझ मत बनाओं. पर हम है कि रुकने का नाम नहीं ले रहे हैं, क्योंकि हमे लग रहा है कि बाद में रुक लेंगे अभी रुक कर क्या करे, पर वास्तविकता यह है की रुकने का समय, प्रकृति की पुकार को सुनने का समय तो बहुत बहले ही आ गया था, लेकिन हम अपनी हठधर्मिता के चलते देरी पर देरी कर रहे हैं.
ए  अंग्रेजी वेबसाइट के मुताबिक पिछले 30 सालों में 23716 औद्योगिक परियोजनाओं के लिए जंगलों की संख्या में भारी गिरावट दर्ज की गयी है. वेबसाइट में लिखा हुआ है कि प्रत्येक वर्ष 250 वर्ग किलोमीटर क्षेत्रफल का जंगल वन कार्यों को छोड़कर अन्य कार्यों के लिए दिया जाता है, ये सरकारी आकड़े हैं और जो वनो की अवैध कटायी होती है उसके आंकड़े हमारे पास नहीं आते हैं, तो आप खुद अंदाजा लगा सकते हैं कि हर साल प्रकृति को कितना नुकसान हो रहा है. जिस अनुबाद में जंगलो को उजाड़ा जा रहा है उस अनुपात में पौधारोपण नहीं किया जा रहा है, क्योंकि काटनें में पांच मिनट लगते हैं और एक बड़ा पेड़ बनने में 25 साल लगते हैं.
यह तो वनों का हाल है जिसका छोटा सा आंकड़ा पेश किया गया है. भूगर्भ जलस्तर का भी यही हाल है. पानी के लिए मारामारी तो शुरु हो चुकी है अलग बात है कि मेरे पढ़ने वाले अभी तक इस मारामारी के चक्कर में नहीं पड़े हैं सिर्फ अखबारों में पढ़ा है, अब जल संरक्षण कैसे करना आप सभी को पता है, आप नहीं करते हैं तो सोच लीजिये आप अपनी आने वाली पीढ़ी के लिए अपने बच्चों के लिए क्या छोड़कर जा रहे हैं.
एक बात हम सभी को समझना होगा कि सरकार को अपना प्रचार करने से फुर्सत नहीं है, खुद को नेता बताने वाले नेता अपनी सियासत करने में व्यस्त हैं, उद्योगपति जैसे तैसे करके नोट बनाने में व्यस्त हैं पता नहीं उन नोटों का क्या करेंगे जब धरती पर जीवन ही नहीं रहेगा. फिर यह जिम्मेदारी हमारी ही बनती है की हम अपनी धरती मां को बांझ होने से बचाये बंजर होने से बचाये. अब और देरी मतलब और ज्यादा नुकसान, इसलिए प्रकृति और पर्यावरण के बचाव के मामले में दूसरों का मुंह देखने के बजाय आप अपने अंदर झांके, शुरुआत खुद से, अपने घर से करे अपने आस पास से करे, और जरुर करे, मैं इसलिए बोल रहा हूं क्योंकि मैं करता हूं. 

हां अगर अब भी हम नहीं सुधरे तो एक सुबह चिलचिलाती धूप और तन को झुलसा देने वाली गर्मी में एसी लगे कमरे में पसीने से नहाकर उठेंगे और आपका पोता, या आपके बेटे का पोता अपने दादाजी से पूछेगा, दादाजी जंगल कैसा होता है, नदीयां कैसी होती हैं, जंगली जानवर किसे कहते हैं, यकिन मानीए आपके पास पछतावा के अलावा और कोई जवाब नहीं होगा. वक्त नहीं है पर सुधर जाइये. सावधान हो जाइये.  


Friday, 1 September 2017

एक सन्नाटा होता था, कहीं दूर ख्यालों के गोतों में डूबोकर अपने साथ बहुत दूर ले जाती थी वो आवाज, सोचता हूं क्या अभी भी गांव में वो अपनापन होगा

आज थोड़ा फुरसत में हुं, मोबाइल स्विच ऑफ है इसलिए नहीं की मैने किया है, बल्कि इसलिए की चार्ज नहीं है, और अभी पता नहीं क्यो चार्ज करने का मन नहीं है. तो फेसबुक वाट्सएप, ट्वीटर सेथोड़ी फुर्सत मिली है. विचार के घोड़े दिमाग के अंदर दौड़ लगा रहे हैं .

पल भर में रांची से दिल्ली पंहुच जा रहा हूं, और एकाएक अतीत का वो खूबसूरत पन्ना खुल गया, विचार ना जाने क्यों आज गांव तक पंहुच गए, पढ़ायी लिखाई और रोजी-रोटी के चक्कर में पिछले 20 सालों में धीरे- धीरे गाांव से वास्ता खत्म होता सा जा रहा है.

इन 20 सालों में कैसे धीरे- धीरे नाम की पहचान बदल कर नंबर में हो गयी पता ही नहीं चला, गांव छुटा शहर आया तो पहले क्वार्टर नंबर मिला, फिर आधार नंबर मिला और अब इम्पलाई नंबर मिल गया, वाकई कितना बदल गया सब कुछ. और सबसे बड़ी बात कि इस पहचान को मै तरक्की की सीढ़ी मानकर खुश होता हूं पर क्या मैं वो हासिल कर पाया जिसके लिए इतनी मेहनत की, मैं जितना आगे बढ़ता गया गांव उतना ही पीछे छूटता गया. कितना सुकून था उस आम पेड़ के नीचे की जड़ में बैठ कर खेलने में, और इमली की डाली पकड़ कर झूला-झूलने में.


अभी भादो का मौसम है, गांव के खेतों में हरे हरे धान ललहलहा रहे होंगे, लबालब तालाब भरे होंगे, और उसमे कूदकर नहाने को वो आंनद चमकदार टाइल्स लगे बाथरुम के अंदर शावर के नीचे नहाने में कभी नहीं आया, खेतों में घुसकर मछली पकड़ने का विचार आज भी मुझे तरोताजा कर देता है. करमा के गीतों की वो धुन, जब भादों अमावस्या में कहीं दूर से कानों में सुनाई देती थी, यकीन मानीये सोनी फिल्पीस, सैंमसंग, जेबीएल किसी भी साउंड सिस्टम से आज तक उतनी मधुर आवाज नहीं सुन पाया.

एक कसक होती थी, एक सन्नाटा होता था, कहीं दूर ख्यालों के गोतों में डूबोकर अपने साथ बहुत दूर ले जाती थी वो आवाज, सोचता हूं क्या अभी भी गांव में वो अपनापन होगा, वहीं मधुर धुन सुनाई पड़ती होगी, या गीत गाने वाले की भी पहचान बदल गयी है.

गांव से आज संवाद खत्म नहीं हुआ है, लेकिन संवाद के माध्यम बदल गये और माध्यम बदलने से भाव भी बदल गये हैं. सबकुछ समय के साथ कैसे बदल गया, पर मन है कि आज उस चीज को ढ़ूढ़ रहा है. सोचता हूं काश फिर भादों अमावस्या की वैसी ही सुनसान रात में करमा की धुन और मधुर गीत सुनाई पड़ती, एक बार फिर से मै उसे जी लेता.  

Thursday, 31 August 2017

सिस्टम के उपर लगी मेकअप की परत हट गयी तो तस्वीर बेपर्दा हो गयी...पर यकिन मानीये माह-ए-गम अगस्त सच में खत्म हो गया...


बीजेपी के नजरिये से कहे तो माह-ए-गम अगस्त खतम हो गया. माह-ए-गम इसलिए क्योंकि जाते जाते जीडीपी का ऐसा घाव दे गया जो समूक्षा विपक्ष कई दिनों तक कुरेदता रहेगा, और जब जब कुरेदेगा तब-तब जीडीपी की याद ताजा हो जायेगी. क्योंकि जो आंकडे जारी किए गये उसके मुताबिक पहली तिमाही जीडीपी की विकास दर 5.7 रही तो पिछले तीन सालों में सबसे कम है. पिछले वित्त वर्ष इसी तिमाही में जीडीपी की ग्रोथ 709 प्रतिशत थी, 

पर पता नहीं इस बार क्या हो गया, खैर हम अर्थशास्त्र के बड़े ज्ञानी नहीं है जो सब कुछ बता दे लेकिन बड़े-बड़े अर्थशास्त्री माथा पीट रहें है. नोटबंदी के जिस फैसले को सरकार बड़ी उपलब्धि बता रही थी, आरबीआई के आंकड़ों ने उन उपलब्धियों की हेकड़ी निकाल दी. फिर जीडीपी की गिरावट को मुद्दा बनाकर विपक्ष सरकार हाय-हाय के नारे लगायेगा. लेकिन कुछ भी कहिए कम्बख्त अगस्त बड़ा बेवफा निकला, उत्तर प्रदेश में सैकड़ों मासूम बच्चों की मौत हो गयी, जिसने मुख्यमंत्री के गृह क्षेत्र में स्वास्थ्य व्यवस्था की बखिया उधेड़ दी, अब जांच के बाद जो भी तथ्य सामने आये, गलती वर्तमान सरकार की रही हो या, पूर्ववर्ती सरकार की बच्चों की जान तो वापस नहीं आ जोयगी. 

अगस्त महीने में ही प्रभु जी कि रेल बेपटरी हो गयी, सुना है मरम्मत करने के लिए पटरी काट दी गयी थी और मरम्मत कार्य चल रहा था, दिल्ली तक खबर भेज दी गयी थी लेकिन सुना किसी ने नहीं. और टूटी पटरी में रेल दौड़ गयी, और उसका ठीकरा प्रभु जी ने खुद अपने उपर फोड़ा, अब प्रभु जी के पास 1000 हांथ और 80000 दिमाग तो नहीं है ना कि सब काम खुद करें अधिकारियों को देखना चाहिए था, 

खैर अगस्त में हुए हादसों के बाद सरकार की खूब किरकिरी हुई, इधर झारखंड में भी यही हाल है, रिम्स के बाहर सुबोधकांत सहाय धरना पर बैठ गये, क्योंकि 28 दिन में 133 बच्चों की मौत हो गयी, जेएमएम ने एमजीएम के बाहर प्रदर्शन किया, इतना सबकुछ अगस्त महीने में हुआ और माह के आखिरी दिन में क्या हुआ उपर में इसका जिक्र हो चुका है. 

क्या करें इस बार बारिश झमाझम हुई और सिस्टम के उपर लगी मेकअप की परत हट गयी तो तस्वीर बेपर्दा हो गयी. पर याकिन मानीये आज अगस्त का अाखिरी दिन है, सितंबर में जरुर मां दुर्गा देश और जनता के लिए अच्छा संकेत लेकर आयेगी.

किसी भी युद्ध और हिंसा की त्रासदी क्या हो सकती है, यह उसे देखने वाले झेलने वाले बेहतर बता सकते हैं, पर इस बच्ची को देखकर क्या लगता है.


इस बच्ची का नाम ओमरान  है, पिता का नाम बुथानिया मोहम्मद मंसूर है. पिछले सप्ताह इस बच्ची की तस्वीर यमन के सोसल मीडिया में वायरल हुई. अपने छोटे छोटे उंगुलियों से फूले हुए आंख को खोलने की कोशिश करती ओमरान  महज चार वर्ष की है, जिसे दुनिया राजनीति झगड़े हथियार,को बारे में कुछ पता नहीं है, लेकिन अपने देश में चल रहे युद्ध ने उसे गहरे जख्म दिए है.

यमन के एल्लपो शहर में हवाई हमले में ओमरान घायल हो गयी थी. इस हमले में ओमरान के पिता बथानिया मोहम्मद मंसूर के अलावा कोई नहीं बचा, ओमरान के पूरे परिवार की मौत हो गयी. मै जानता हूं आप सोच रहे हैं मै यह कहानी आपको क्यों बता रहा हू जबकि यह कहानी हमारे देश की है भी नहीं. हां यह मेरे देश की कहानी नहीं है और प्रार्थना करता हूं मेरे देश की किसी भी बच्ची की ऐसी तस्वीर दुनिया के सामने नहीं आये.

बच्ची युद्ध की शिकार है, पर सवाल यह है कि आखिर युद्ध क्यों क्या बातचीत से मसले का हल नहीं किया जा सकता है या बातचीत करने का प्रयास नहीं किया जाता है. दरअसल आज हम ऐसे हथियारों के बीच में जी रहे है जो पूरी इंसनी सभ्यता के लिए एक खतरा है. मारक मिसाइल, केमिकल हथियार जैसे कई तरह के हथियार हमने बना लिए हैं, और हम किसी से कमजोर नहीं है यह सोच युद्ध के लिए प्रेरित करता है. इस लेख पर कई लोगों को मतभेद हो सकता है और होना लाजमी है, कुछ लोग अनपढ़ या गवांर भी समझे, क्योंकि कई ऐेसे बिंदु है जो बिना छुए मैं लिख रहा है.




आतंकवाद का जिक्र मैने नहीं किया है., मै यहां पर युद्ध के खतरे और त्रासदी का जिक्र कर रहा हूं. विश्व समुदाय को ऐसी तस्वीरो को देखकर विश्व शांति की पहल करनी चाहिए. जिंदगी बहुत अनमोल होती है और मुश्किल भरी भी होती, ओमरान इस चीज को भली भांति समझ रही होगी, और जो घाव 4 वर्ष की उम्र में इसे मिला है ताउम्र उसे भूल नहीं पायेगी. ..

फोटो साभार: ट्वीटर, एचटी टाइम्स 

Wednesday, 30 August 2017

एक वक्त ऐसा आयेगा जब हम पूरी तरह इसी दुनिया के होकर रह जाएगें




वाट्सएप, फेसबुक, ट्वीटर, इंस्टाग्राम, ब्लॉग, ना जाने कितने ऐसे सोसल साइट्स आज के हाइटेक युग में उपलब्ध है जो आपकी जिंदगी का हिस्सा बन चुका है. आप भले ही शाम के वक्त दोस्तों के साथ वक्त ना बिताएं लेकिन समय मिलते ही सोसल मिडिया में एक्टीव हो जाते हैं. 

शहर की जिंदगी में भागदौड़ तो पहले से ही थी और एक समाज में रहने के बावजूद पड़ोसियों से मिलने का वक्त नहीं निकाल पाते थे और अब तो शहरों की हालत यह है कि लोग अपनों के लिए समय नहीं निकाल पाते हैं और शायद इसलिये सेल्फी का प्रचलन आया की जब कभी -कभार, भूले -भटके आप दोस्तों से मिलते हैं, परिजनों से मिलते है तो झट से तस्वीरे खींच कर उसे शेयर कर देते हैं. 

क्योंकि यही अब वास्तविक दुनिया बनी जा रही है. वर्चूअल वर्ल्ड ने हमारी जिंदगी में एक खास जगह बना ली है, हम घर बैठे सुविधाएं चाहने  लगे है और धीरे-धीरे एक वर्चुअल वर्ल्ड हम खुद अपने लिए बनाते जाते रहे हैं, जहां दोस्त भी वर्चूअल है, और हम उनसे अपनी बाते भी शेयर करते हैं. सब कुछ हमे वर्चूअल वर्ल्ड में मिल जाता है.

 एक वक्त ऐसा आयेगा जब हम पूरी तरह इसी दुनिया के होकर रह जाएगें, और यही हमे सच लगने लगेगा फिर इंसान समाजिक प्राणी न हीं रह जाएगा. तो इसके खतरे का अंदाजा हम बेहतर लगा सकते हैं कि हम कहां जा रहे हैं किस ओर जा रहे, टेक्नोलॉजी का इस्तेमाल करना अच्छी बात है, टेक्नोफ्रेंडली होना अच्छी बात है लेकिन उसमे डूब जाना और डूब कर अपनों से दूर हो जाना अच्छी बात नहीं है, हमें याद रखना चाहिए कि सामाजिक प्राणी है और इसी से हमारा अस्तित्व है. 

Tuesday, 29 August 2017

लोकतंत्र मंर रहा है और हम लोकतंत्र की चीत्कार को अट्टाहस का शोर मान खुशियां मना रहें है.

कमजोर पत्रकारिता से लोकतंत्र कमजोर होता है, और कमजोर लोकतंत्र में आम जन परेशान होता है 

लोकतंत्र में हमें वोट देने का अधिकार है, और अगर हम वोट देते हैं तो हमें सवाल पूछने का भी अधिकार है. लेकिन ऐसा लगता है मौजूदा दौर में हम सवाल पूछने की परंपरा को त्याग चुके हैं और फैन बन चुके हैं, जो लोकतंत्र के लिए खतरे का संकेत है. पत्रकारिता में पढ़ा था की मजबूत पत्रकारिता लोकतंत्र में विपक्ष के रुप में काम करता है, सावल पूछता है लेकिन अब तो वो भी नहीं दिखायी देता है और ना ही सुनाई देता है.

ऐसा लगता है नेताओं के विकास विकास के शोर में विकास कहीं पीछे छूट गया है और पूरी जनता विकास को छोड़कर शोर के पीछे भाग रही है,यथार्थ को पहचानने की कोशिश कोई नहीं कर रहा है. सत्ता विकास के शोर में मगन में, विपक्ष सियासत के लिए मुद्दें तलाश रहा है, अफसरशाही अाराम फरमा रही है, और जनता तमाशा देखते हुए तमाशे का हिस्सा बन रही है. और इन सबके बीच आम आदमी दम तोड़ रहा है, इलाज के आभाव में बच्चों की मौत हो रही है.

सरकारी योजनाओं को जन-जन तक पहुंचाने के लिए 36 लाख रुपए के एलईडी युक्त दर्जनों वाहन राज्य भर में घूम रहे हैं और एंबुलेस के आभाव में खूंटी के कालामाटी में छात्रा की मौत हो जा रही है. गुमला में एक पिता को अपने मृत बच्चे को घर ले जाने के लिए एंबुलेंस नहीं मिल रहा है, अपने पीठ पर अपने मृत बेटे का शव ले जा रहा है, दवाओं के नाम पर हजारों करोड़ रुपये खर्च किये जा रहे हैं पर 50 रुपये नहीं मिलने के चलते बच्चे की मौत हो जा रही है. राज्य के सबसे बड़े अस्पताल रिम्स में 28 दिन में 133 बच्चों की मौत हो गयी है, मरीज को जमीन के नाली के पास सुलाकर इलाज कराया जा रहा है और सरकार उद्घाटन और शिलान्यस करने में व्यस्त है. 



जमशेदपुर के एमजीएम अस्पताल में एक महीने के अंदर 164 बच्चों की मौत हो गयी, वजह किसी को पता नहीं जांच की जा रही है, एनएचआरसी स्पष्टीकरण मांग रहा है, विपक्ष इस्तीफा मांग रहा है. पर मौत सिस्टम की जिस लापरवाही से हुई उसे सुधारने का प्रयास कोई नहीं कर रहा है. यह वो आंकड़ें है जो सामने आये हैं, बाकि और कितनों की मौत हुई होगी जांच का विषय हो सकता है. स्कूलों में मिड डे मिल, गांवों में आंगनबाड़ी, पोषण सखी, ममता वाहन, गरीबों को मुफ्त चावल ना जाने समाजिक कल्याण की कितनी योजनाएं है और योजनाओं के नाम पर करोड़ों का बंदरबांट है, और झारखंड की राज्यपाल खुद कह रही है कि राज्य में 75 फीसदी आदिवासी बच्चे कुपोषित है.

हाइकोर्ट तक को दखल देकर यह कहना पड़ रहा है कि इस राज्य में आमलोगों की परेशानी समझने वाला कोई नहीं. सिर्फ स्वास्थ्य ही नहीं राज्य में बाकी सेवाओं का भी यह हाल है. बुनियादी सुविधाओं की घोर कमी है, स्कूलों में शिक्षकों की संख्या पर्याप्त नहीं है और टेट पास शिक्षक सड़क पर आंदोलन कर रहे हैं. राज्य के स्तर पर कोई भी नियुक्ति होती है उसे हाइकोर्ट से गुजरना पड़ता है. इन सबके बीच सरकार हाथी उड़ाने में व्यस्त है. यह इसलिये क्योंकि सवाल पूछने वाले चुप है. पर सभी को समझना होगा की सिर्फ बच्चों की मौत नहीं हो रही है लोकतंत्र मंर रहा है और हम लोकतंत्र की चीत्कार को अट्टाहस का शोर मान खुशियां मना रहें है. लेकिन कब तक ध्यान रहे दुनिया गोल है कभी आपका भी नंबर आ सकता है. हां मन को सुकुन से भर ले अगस्त खत्म हो रहा है...