कहां भागे जा रहे हो ? थोड़ा रुको, संभलों, नहीं अभी
समय नहीं है. अभी समय नहीं है का तात्पर्य क्या है, कि हमे इतने रफ्तार में
आगे बढ़े, आगे जाये की सब कुछ पीछे छूट जाये, हमें गिरने का डर नहीं हो,
गिर कर चोट लगने का डर नहीं हो, पर वाकई में देखने से लगता है डर तो नहीं
है. अंधी दौड़ में सब कुछ पीछे छोड़ते हुए, ठीक उसी तरह जैसे बम फूटने के
बाद धुएं का गुब्बार क्षण भर में गायब हो जाता है.
आज इंसान भी वैसे ही
गायब होता जा रहा है. किसी को किसी के खोज खबर लेने की फुर्सत नहीं है. हम
सिर्फ और सिर्फ खुद में केंन्द्रित होते जा रहे हैं. आत्ममुग्धता अच्छी बात
है, लेकिन यह उतनी ही बुरी बात है अगर सिर्फ खुद के लिए सोचा जाये.
जिंदगी में भागदौड़ अच्छी बात है, आगे बढ़ने की होड़ अच्छी बात है. यह सच
है कि जीवन बदला है, जीने का तरीका बदला है, पर बदलते जीवन में हम अपने
पौराणिक परंमपराओ की बलि चढ़ा दे यह तो पूरी तरह अनैतिक है.
अब छोटे बच्चों
में अपना बचपन नहीं दिखाई देता है. ना वो बचपना दिखता है, ना वो अल्हड़पन
दिखता है. कहां खो गये सब, कहीं ऐसा तो नहीं कि हमने अपने बचपन को जी लिया
और उसकी लिखावट को हमेशा के लिए मिटा दिया ताकि कोई उसे पढ़ नहीं सके. या
फिर हम वो माता-पिता नहीं बन पा रहे हैं, जैसे हमारे है, या हमारे
माता-पिता वो दादा-दादी, नाना, नानी नहीं बने पा रहे हैं जैसे हमारे थे. यह
सोचने वाली बात है कि हमारी पीढ़ी में हमने जो सीखा वो अपने बाद की पीढ़ी
का बता नही पाये तो हमारे बाद वाली पीढ़ी क्या बता पायेगी. यह सच है.
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हमारा
बचपन घर से ज्यादा स्कूल, खेल का मैदान, खेत खलिहान में बीता तब हम ऐसे हो
गये हैं, जरा सोचिये कि जिनका बचपन पांच इंच के स्मार्टफोन और 32 इंच की
एलइडी टीवी के साथ बीत रहा है वो कैसे होंगे. माना आगे बढ़ना है,लेकिन इतने
आगे मत बढ़ जाइए की आप अकेले हो जाये और फिर सब कुछ हासिल होने के बाद भी कुछ ना हो.

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