

अब छोटे बच्चों
में अपना बचपन नहीं दिखाई देता है. ना वो बचपना दिखता है, ना वो अल्हड़पन
दिखता है. कहां खो गये सब, कहीं ऐसा तो नहीं कि हमने अपने बचपन को जी लिया
और उसकी लिखावट को हमेशा के लिए मिटा दिया ताकि कोई उसे पढ़ नहीं सके. या
फिर हम वो माता-पिता नहीं बन पा रहे हैं, जैसे हमारे है, या हमारे
माता-पिता वो दादा-दादी, नाना, नानी नहीं बने पा रहे हैं जैसे हमारे थे. यह
सोचने वाली बात है कि हमारी पीढ़ी में हमने जो सीखा वो अपने बाद की पीढ़ी
का बता नही पाये तो हमारे बाद वाली पीढ़ी क्या बता पायेगी. यह सच है.
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हमारा
बचपन घर से ज्यादा स्कूल, खेल का मैदान, खेत खलिहान में बीता तब हम ऐसे हो
गये हैं, जरा सोचिये कि जिनका बचपन पांच इंच के स्मार्टफोन और 32 इंच की
एलइडी टीवी के साथ बीत रहा है वो कैसे होंगे. माना आगे बढ़ना है,लेकिन इतने
आगे मत बढ़ जाइए की आप अकेले हो जाये और फिर सब कुछ हासिल होने के बाद भी कुछ ना हो.
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