Monday, 13 August 2018

नीला वाला वो फूल नीलकंठ है, जो शिवजी को बहुत पसंद है, याद है तुमने ही मुझे पहली बार बताया था....


सावन का महीना था, सुबह से ही बारिश हो रही थी. पता नहीं क्यों आज बहुत दिनों बाद सोचा कि मंदिर हो आंऊ, वैसे भी भगवान से रिश्ता टूटे हुए कई बरस  बीत चूके थे. पर आज मन हुआ कि मंदिर जाकर भगवान को इस जिंदगी के लिए शुक्रिया बोल कर आंऊ. थोड़ी बारिश कम हुई तो बिना छाता लिए ही घर से मंदिर के लिए निकल गया. सोचा उस पहाड़ी वाली शिवजी के मंदिर जांऊ, जहां आखिरी बार तुमने मुझे अलविदा कहा था. 


आज कई बरस बाद उस मंदिर की सीढ़ियां चढ़ रहा था, पर आज मन हल्का था, सीढ़ी चढ़ते हुए एक- एक पड़ाव पार कर रहा था. जैसे-जैसे सीढ़ियां चढ़ता जा रहा था, आंखों के सामने से वो तुम्हारे साथ बीताये  गये आखिरी पल सिनेमा स्क्रिन की तरह नाच रहे थे. बारिश से सीढ़ियां भी गीली हो रही थी और मेरे अंदर की बारिश से मैं भी गीला हो रहा था, आधी सीढ़ियां चढ़ जाने के बाद तो मुझे लगा जैसे मैं यह क्या कर रहां हूं, मुझे वापस चले जाना चाहिए, लेकिन मन के अंदर से ही आवाज आयी की आखिर कब तक भागोगे खुद से सामना करो इस सच का कि जिसके लिए तुम सबकुछ छोड़ चुके हो वो अपनी जिंदगी में सबकुछ हासिल कर रही है. उसने तुम्हारे लिए क्या छोड़ा जो तुम उसके  लिए छोड़ रहे हो, डरे हुए मेरे मन ने धीरे से जवाब दिया, प्यार भी तो मैने ही किया था. इस उधेड़बुन में कब मंदिर की सीढ़ियां चढ़कर मुख्य मंदिर में पहुंच गया पता ही नहीं चला, शिवलिंग पूरा नीले पीले लाल और सफेद फूलों  और बेलपत्र से  ढंका हुआ था. नीला वाला वो फूल नीलकंठ है, जो शिवजी को बहुत पसंद है, याद है तुमने मुझे पहली बार बताया था 


मैं पूजा करने लगा, ऐसा लग रहा था मेरे मन का गुस्सा फूट कर बाहर निकलने वाला है, और भगवान मुझे सांत्वना दे रहे हैं कि जो हुआ सो हुआ अब आगे बढ़ जाओ, पर कैसे बढ़ूं, इस मंदिर की सीढ़ियां भी तो मैने पहली बार उसके साथ ही पार की थी. मैं अगरबत्ती जलाने लगा, मुझे याद आया कि हर बार अगरबत्ती मैं पकड़ता था और माचिस तुम जलाते थे, पर आज मैं अकेला था. पूजा करने के बाद मंदिर के नीचे गया जहां पर नारियल फोड़ने के लिए स्थान बना आ था, तुम मुझे अक्सर कहती थी कि नारियल एक बार फोड़ना चाहिए, मैने एक बार में नारियल फोड़ा. आज पहली बार मैने भगवान से पूजा में तुम्हें नहीं मांगा. पूजा करने के बाद मैं सीढ़ियों से नीचे आ रहा था.  मैं उतरते हुए उस मोड़ पर पहुंचा जहां से हमलोग अलग हो गये थे, मैं उस मोड़ पर पहुंचा तो मेरी धड़कने अचानक तेज हो गयी, ये वहीं अहसास था जब तुम सामने होती थी, तो क्या आज फिर तुम आस-पास  हो, आगे बढ़ा तो देखा सच में तुम आ रही थी. सर पर दुपट्टा और हाथों में पूजा की टोकरी, कितने बरस बीत गये थे आज तुमको देखा, तुम उतनी ही सुंदर लग रहे थे. हां बीतते हुए वक्त ने तुम्हारे बालों और चेहरे में अपनी छाप छोड़ दी थी. मैं तुम्हें देख ही रहा था कि तुम नजर झुकाये मेरे सामने से गुजर गये तुमने तो मुझे देखा भी नहीं, क्या इतना बदल गये थे तुम, अपनी जिंदगी में आगे बढ़ते हुए तुम सीढ़ियों से उपर जा रहे थे, और मैं वहीं पर खड़ा तुम्हें देख रहा था. 


तुम्हारे इस तरह चले जाने से मेरे पैर जड़ हो गये थे लेकिन पता नहीं अचानक मेरे पैर में कहां से जान आ गयी और मैं बेतहासा सीढ़ियों से उपर भागा, मुझे लग रहा था मैं तुम्हें रोक कर पूंछु की इतने साल तुमने क्या किया, क्या एक बार भी तुम्हें मेरी याद नहीं आयी. तबतक हम दोनों उसी शिवलिंग के सामने थे. हाथ जोड़कर आंखे बंद किये पता नहीं क्या मांग रहे थे. तुम्हें ऐसे देखकर हमेशा मैं कहता था कि तुम कितनी सुंदर दिख रही हो, क्या तुम आज वही सुनने की कोशिश कर रहे थे. माफ करना लेकिन आज मैं नहीं कह सकता था, जमाने और अपने ही प्यार की कसम ने मुझे रोक रखा था, और कहता भी तो कैसे तुम्हारे ठीक बगल में तुम्हारे पति तम्हारे बच्चे को गोद में लिए बता रहे थे, यह नीला फूल नीलकंठ है, यह भगवान शिव को बहुत पसंद है. उसके बाद तुम्हारे पति ने अगरबत्ती पकड़ा और तुमने माचिस से अगरबत्ती जलायी. मैं तो अकेले अगरबत्ती जलाना सीख गया, पर तुम आज तक नहीं सीख पाये. अपने पति में तुमने मेरा अक्स तो देख लिया लेकिन मैं किसी में तुम्हें नहीं देख पाया. 

फिर मैं मंदिर से सीढ़ियां उतरने लगा, मुझे यह यकीन हो गया था कि वाकई अपनी जिंदगी में तुम आगे बढ़ गये हो. पर मैं उसी मोड़ जाकर रुक गया, कुछ देर बाद तुम उसी जगह पर थे, उसी  बेंच पर उसी जगह बैठकर ऊंचाई से नीचे देख रहे थे. मैंने नजर बचाकर तम्हें देखा, तुम अकेले थे, और तुम्हारें आखों के रास्ते तुम्हारा सब्र गालों पर उतर रहा था, तुम उसे छिपाने की नाकाम कोशिश कर रहे थे. धीरे-धीरे बारिश बढ़ रही थी, और मैं सीढ़ियों से नीचे उतर रहा था...





Friday, 10 August 2018

जिनका बचपन पांच इंच के स्मार्टफोन और 32 इंच की एलइडी टीवी के साथ बीत रहा है वो कैसे होंगे...

कहां भागे जा रहे हो ? थोड़ा रुको, संभलों, नहीं अभी समय नहीं है. अभी समय नहीं है का तात्पर्य क्या है, कि हमे इतने रफ्तार में आगे बढ़े, आगे जाये की सब कुछ पीछे छूट जाये, हमें गिरने का डर नहीं हो, गिर कर चोट लगने का डर नहीं हो, पर वाकई में देखने से लगता है डर तो नहीं है. अंधी दौड़ में सब कुछ पीछे छोड़ते हुए, ठीक उसी तरह जैसे बम फूटने के बाद धुएं का गुब्बार क्षण भर में गायब हो जाता है.  

आज इंसान भी वैसे ही गायब होता जा रहा है. किसी को किसी के खोज खबर लेने की फुर्सत नहीं है. हम सिर्फ और सिर्फ खुद में केंन्द्रित होते जा रहे हैं. आत्ममुग्धता अच्छी बात है, लेकिन यह उतनी ही बुरी बात है अगर सिर्फ खुद  के लिए सोचा जाये. जिंदगी में भागदौड़ अच्छी बात है, आगे बढ़ने की होड़ अच्छी बात है. यह सच है कि जीवन बदला है, जीने का तरीका बदला है, पर बदलते जीवन में हम अपने पौराणिक परंमपराओ की बलि चढ़ा दे यह तो पूरी तरह अनैतिक है. 


अब छोटे बच्चों में अपना बचपन नहीं दिखाई देता है. ना वो बचपना दिखता है, ना वो अल्हड़पन दिखता है. कहां खो गये सब, कहीं ऐसा तो नहीं कि हमने अपने बचपन को जी लिया और उसकी लिखावट को हमेशा के लिए मिटा दिया ताकि कोई उसे पढ़ नहीं सके. या फिर हम वो माता-पिता नहीं बन पा रहे हैं, जैसे हमारे है, या हमारे माता-पिता वो दादा-दादी, नाना, नानी नहीं बने पा रहे हैं जैसे हमारे थे. यह सोचने वाली बात है कि हमारी पीढ़ी में हमने जो सीखा वो अपने बाद की पीढ़ी का बता नही पाये तो हमारे बाद वाली पीढ़ी क्या बता पायेगी. यह सच है. 



हमारा बचपन घर से ज्यादा स्कूल, खेल का मैदान, खेत खलिहान में बीता तब हम ऐसे हो गये हैं, जरा सोचिये कि जिनका बचपन पांच इंच के स्मार्टफोन और 32 इंच की एलइडी टीवी के साथ बीत रहा है वो कैसे होंगे. माना आगे बढ़ना है,लेकिन इतने आगे मत बढ़ जाइए की आप अकेले हो जाये और फिर सब कुछ हासिल होने के बाद भी कुछ ना हो.

Tuesday, 20 March 2018

शायद फिर से वो चिरई वापस आ जाये वाऔर फिर से उसी बांस की झुरमुठ पर बैठकर मेरी जेठ की अलसायी शाम को अपनी चहचहाहट से तरोताजा कर दे...विश्व गौरेया दिवस विशेष






फोटो साभार: इंटरनेट




गौर से देखिये यह वही गौरेया है जो कभी झुंड के झुंड आपके घर आंगन में, मुंडेरों पर, छत में चहचहाती हुई अठखेलियां किया करती थी. पहचान में नहीं आ रहा है ना, आपको याद भी नहीं है कि आपने अंतिम बार इस छोटी से प्यारी सी चिड़ियां को कब देखा था. पर इसे पहचानने के बाद मुझे यकिन है कि सभी को उनका बचपन जरुरत याद आयेगा, जब फुदकती हुई गौरेया उनके आस-पास घुमती थी. 

फोटो साभार: इंटरनेट
सुबह की शुरुआत उनके चहचहाने से होती थी और शाम की थकावट भी उसी चहचहाहट में कहीं गुम सी हो जाती थी. पर अब ना जाने वो कहां चली गयी है. अब तो वो दिखायी भी नहीं पड़ती है. उसका चहचहाना मानों शांत सा हो गया है. अब तो आख भी अलार्म सुनकर ही खुलती है. 

यह कहीं राख बनकर उड़ होंगे....और उस आग की तपिश में आपके अपने भी जलेंगे.  

आकंड़े बताते है कि गौरेया की संख्या 60 से 80 फीसदी तक कम हो गयी है. गौरेया चिड़िंया हम इंसानों की सबसे अच्छी दोस्त और करीबी मानी जाती है, यह घरों में ही घोंसला बनाकर रहती है. अब भी गांवों के पूराने घरों में इनके घोंसले दिख जायेंगे, पर अब वो घोंसले वीरान हो चुके हैं, उन्हें झाड़ने पर गौरेया के पंख भी नजर नहीं आते हैं. 

फोटो साभार: इंटरनेट 
दरअसल हम इंसानों की महत्वाकांक्षा और सुविधाओं का उपभोग करने की बुरी आदत ने गौरेया को आज इस कगार पर लाकर खड़ा कर दिया है. खेतों में इतने कीटनाशक का प्रयोग होता है कि खेतों में अब कीट-फतिंगा होता ही  नहीं है जो गौरेया का चारा है. मोबाइल रेडियेशन, प्रदूषण को यह छोटी से मासूम चिड़ियां बर्दास्त नहीं कर पाती है इसलिए यह हमसे दूर होती जा रही है. इनकी संख्या में काफी तेजी से गिरावट आ रही है. गौरेया के प्रति लोगों को जागरुक करने के लिए बिहार सरकार ने गौरेया को राजकिय पक्षी भी घोषित कर दिया है लेकिन उसके बावजूद गौरेया दिख कहां रहें हैं. 

फोटो साभार: इंटरनेट 
मेरा बचपन गांव में गुजरा, मेरे लिए चिड़ियां का मतलब ही गौरेया था. मिट्टी के कच्चे मकान में मेरे साथ गौरेया भी रहती थी. कई बार उनके अंडे हमारे घरों के अंदर गिरकर फूट जाते थे. घर बाहरी उंची दिवार पर बड़े-बड़े छेद बने हुए थे जिसमे वे रहते थे और दिन भर आंगन में और घरे के सामने स्थित अमरूद के पेड़ पर चहचहाते रहते थे.शाम के वक्त बांस की झुरमुठ से उनकी चहचहाहट सुनाई पड़ती थी लेकिन अब जब गांव जाता हूं तो एक भी गौरेया नजर नहीं आती है. घर तो वही है लेकिन उनके घोंसले खाली हो गये हैं.  पता नहीं दिल करता है उन्हें फिर से बुला लूं लेकिन शायद वो नहीं आयेंगे. हमारी गलतियों के कारण ही वो हमसे दूर हो गये हैं और अपने वजूद की लड़ाई लड़ रहे हैं. क्या एक बार हमे उनका साथ नहीं देना चाहिए, शायद  फिर से वो चिरई वापस आ जाये वापस आ जाये और फिर से उसी बांस की झुरमुठ पर बैठकर मेरी जेठ की अलसायी शाम को अपनी चहचहाहट से तरोताजा कर दे...



Friday, 23 February 2018

यह कहीं राख बनकर उड़ होंगे....और उस आग की तपिश में आपके अपने भी जलेंगे.


यह कहीं राख बनकर उड़ होंगे....और उस आग की तपिश में आपके अपने भी जलेंगे. 





यकीनन यह घनी छांव कल नहीं रहेगी
फिर सफर में रुककर सुस्ताओगे कहां
तपते रहोगे कंक्रीट की छत के नीचे
पेड़ की छांव का सुकून पाओगे कहां
अमीर तो एसी लगाकर चैन से सोयेेंगे
गरीब राहगीर को छांव मिलेगी कहां
पेड़ थे, तो जीभर आम खाते थे
अब खरीदोगे नहीं तो आम पाओगे कहां
अगर जरा सोचते तो भीड़ ना बढ़ाते
भीड़ ना बढ़ाते तो पेड़ नहीं कटती
बढ़ा रहे हो इंसान हो
घटा रहे हो पेड़ को
कभी पेड़ की छांव में बैठकर सोचो
मरने के बाद जलने के लिए लकड़ी पाओगे कहां

View of Ranchi Lohardaga Road 

अगर आपको भी यह शौक है कि सड़क के दोनो ओर बडे-बड़े पेड़ हो और आप उसमे चलकर जाये, तो रांची लोहरदगा सड़क पर एक सप्ताह के अंदर यह शौक पूरा कर लिजिये,वरना रांची लोहरगा मार्ग पर आपको यह पेड़ नहीं दिखेंगे, क्योंकि विकास के नाम पर तो सब पेडों की बलि चढ़ाई जा रही है.  


Trees payed for devlpoment

बड़े-बड़े मशीनों से इनपर प्रहार किया जा रहा है. इन्हें जड़ से उखाड़कर फेंक दिया जा रहा है. यह इस बात का सबूत है कि अगर विकास के रास्ते में आओगे तो जड़ से उखाड़ कर फेंक दिये जाओगे. हलांकि मैने देखा की जड से उखड़ जाने के बाद, कट जाने के बाद भी यह अपने वजूद के लिए बड़े से मशीन से संघर्ष कर रहे थे. बार बार टूट चुके पेड़ के तने को तोड़ने के प्रयास मशीन कर रही थी लेकिन बार बार फिर से वो तने उठ खड़ हो रहे थे मानो कह रहे हो एक बार और जोर लगाओ. 

बढ़ती उर्जा की भूख को मिटाने के लिए सरकार ने इस इलाके की खूबसूरती को मिटाने की परियोजना तैयार कर दी थी


Ranchi Lohardaga Road under construction

 पढ़ा और सुना था एक वृक्ष सौ पुत्र के समान होता है तो फिर जरा अंदाजा लगा लिजिये कि विकास के नाम पर कितने पुत्र की बलि चढ़ गयी और बलि चढ़ने वाली है. सोचिये क्या इतने बड़े पैमाने पर हो रहे वृक्ष संहार का कोई और विक्लप हो सकता था. अगर विज्ञान इतनी तरक्की कर चुका है कि मिनटों में एक विशालकाय पेड़ को धराशायी कर सकता है तो क्या एक घंटे या एक दिन में इतना ही बड़ी पेड़ दूसरी जगह पर खड़ा कर सकता है, जवाब आपको पता है. 

Ranchi Lohardaga Road


खैर एक बार देख आइये, तस्वीरें भी रखे लिजिये, क्योंकि आप या आपकी आने वाली पीढ़ी इन्हें नहीं देख पायेगी. यह कहीं राख बनकर उड़ होंगे....और उस आग की तपिश में आपके अपने भी जलेंगे. 

Friday, 10 November 2017

जानती हो हमारे बीच एक ऐसा रिश्ता था, जिसे हम चाहकर भी कोई नाम दे नहीं सकते थे...जो हमे दिखाई नही देती थी या हम देखना नहीं चाहते थे


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पता है आज तुम्हारी बहुत याद आ रही है, जानता हूं तुम यहां नहीं हो मेरे साथ नहीं हो, मेरे शहर से इतनी दूर हो कि शायद मेरी याद को वहां पहुंचने में कुछ घंटे का वक्त लग जाये. पर वो कुछ घंटे कई सदियों के बराबर होंगे, कैसे यकीन दिलाउं आज कि तुम्हारे बिना हमेशा अधूरा ही रहूंगा, तुम्हारे जाने के बाद ऑफिस में अधिक समय बीताता हूं, देर रात तक ऑफिस में बैठा रहता हूं, कोशिश करता हूं की शाम में ऑफिस में ही किसी कंंप्यूटर के आगे टक-टक करता रहूं भले ही कोई काम नहीं हो पर जबरदस्ती उस शाम से दूर भागने के लिए मैं यहीं बैठा रहता हूं, इसलिये शायद अब दोस्त भी साथ छोड़ दे रहे हैं, शाम में दफ्तर से निकल कर मेरे दोस्तों के साथ वक्त बीताना तुम्हे अच्छा नहीं लगता था, पता है मैने वो छोड़ दिया है. सच कहूं तो डर लगता है अब बाहर जाने में, क्या करूं काम के सिलसिले में हमेशा शहरों की शोर से दूर गांवों में जाता हूं , 

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 जानती हो लौटते वक्त कहीं सुनसान सड़क के किनारे बाइक खड़ा करके घंटों अकेले में तुमसे बात करता हूं. शाम में पहाड़ों के पीछे डूबता हुआ सूरज मुझे तुम्हारे आगोश में ले जाता है. उसका सुर्ख लाल रंग मेरे अंदर कई तरह के रंग भर देता है, जिसमे प्यार का रंग और गहरा हो जाता है. दिसंबर का आखिरी सप्ताह है, ठंड अपने पूरे शबाब पर है, लेकिन जब भी रात होती है यकीन मानो तुम्हारे साथ बीताये गये हसीन लम्हों की याद इतनी जोर से दस्तक देती है कि सिरहाने से नींद उड़ जाती है. आधी रात के बाद भी घंटो तक छत पर जाकर चांद को देखता रहता हूं. 

बढ़ती उर्जा की भूख को मिटाने के लिए सरकार ने इस इलाके की खूबसूरती को मिटाने की परियोजना तैयार कर दी थी  

जानते हो उस वक्त का सुकून मुझे तुम्हारे पास होने का एहसास देता है. याद है उन दिनों पर चांद को देखकर अपने प्यार का इजहार किया करते हैं क्या तुम अब भी चांद को देखते हो या फिर उस शहर की चकाचौंध रोशनी में चांद कही छिप जाता है, हो सकता है आसमान के धूंध में तुम्हे चांद तो नहीं दिखता होगा, लेकिन यकीन से कह सकता हूं तुम चांद को देखने की कोशिश जरुर करती होगी. तुम अक्सर कहती थी ना जो होता है अच्छे के लिए होता है, 

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सच बताउं आज तक समझ में नहीं आया कि आखिर अच्छा क्या हुआ, सबकुछ तो था हमारे बीच, जानती हो हमारे बीच एक ऐसा रिश्ता था, जिसे हम चाहकर भी कोई नाम दे नहीं सकते थे, हम साथ-साथ तो थे लेकिन फिर भी एक दूरी थी, जो हमे दिखाई नही देती थी या हम देखना नहीं चाहते थे. बस उस रिश्ते की मौज में यूंं ही नादान परिदों की तरह हम उड़ रहे थे, कभी मैं आगे निकल रहा था कभी तुम आगे निकल रही थी. साथ उड़ते हुए भी साथ में नहीं उड रहे थे. 

तुम्हे जमाने का डर था और मुझे तुम्हे खोने का डर, आज मैं एक बात कहूं तुम्हारे जाने के लगभग 13 महीने के बाद मैंने जीना सीख लिया है, पर अभी भी कुछ नहीं बदला है, हां तुम्हारी बेटी बड़ी हो गयी होगी, पर वो तस्वीर अभी भी याद में ताजा है जब तुम आंख बंद किये सिर पर दुपट्टा लेकर मंदिर में पूजा कर रही थी, मै बाहर था और एक कार की रोशनी तुम्हारे चेहरे पर पड़ रही थी, सच बताऊं मेरी पूजा तो वही थी, जो मैं देख रहा था.....

Monday, 6 November 2017

बढ़ती उर्जा की भूख को मिटाने के लिए सरकार ने इस इलाके की खूबसूरती को मिटाने की परियोजना तैयार कर दी थी


कोईल कारो परियोजना के विरोध स्थल की जन्मस्थली, जब विरोध कर रहे लोगों पर बरसायी गयी थी गोलियां, आठ ग्रामीण हुए थे शहीद


photo by Pawan

एक फरवरी 2001 तोरपा प्रखंड के इतिहास में हमेशा याद रखा जायेगा जब कोयल कारो पनबिजली परियोजना का विरोध कर रहे आदिवासी ग्रामीणों पर पुलिस ने गोलियां बरसायी थी और आठ ग्रामीण शहीद हो गये थे. यह विरोध कोयलकारो जनसंगठन की अगुवाई में किया गया था, ग्रामीण एकजुट होकर अपनी जल जगंल और जमीन बचाने का विरोध कर रहे थे. विरासत में मिली अपनी दमदार और अदभूत् सांस्कृतिक पहचान को बचाने की लड़ाई लड़ रहे थे. 

तोरपा प्रखंड के लोहाजिमी, तपकरा
photo by Pawan
के आसपास का इलाका जिसे प्रकृति ने असीम सुंदरता दी है. उंचे पहाड़ है घने जंगल है और कल-कल बहते झरने है, लेकिन बढ़ती उर्जा की भूख को मिटाने के लिए सरकार ने इस इलाके की खूबसूरती को मिटाने की परियोजना तैयार कर दी थी. शायद इसे इलाके के लोगों का दुर्भाग्य ही कहेंगे क्योंकि कुदरत ने जो इन्हें वरदान के रुप में दिया है वहीं इनके लिए अभिशाप हो गया है. तभी तो विरोध करने की नौबत आ गयी थी. 

photo by Pawan 
दरअसल कोयल कारो पनबिजली परियोजना की शुरुआत 1958 में बिहार सरकार के द्वारा की गयी थी, उस समय यह एशिया की दूसरी सबसे बड़ी पनबिजली परियोजना मानी जाती थी. इसके बाद भारत सरकार के उपक्रम एनएचपीसी को निर्माण की जिम्मेवारी सौंपी गयी. 1881 में एनएचपीसी ने परियोजना को लेकर काम शुरु किया. लेकिन बाद में विस्थापन के डर से कोयलकारो जनसंगठन के बैनर तले ग्रामीणों नें विरोध शुरु किया, विरोध लागातार जारी था लेकिन इसे दरकिनार करते हुए तत्कालीन प्रधानमंत्री पीवी नरसिंम्हा राव ने परियोजना के शिलान्यास की घोषणा कर दी. 

इस घोषणा के साथ ही परियोजना विरोध संगठनो सहित झारखंड पार्टी और कई राजनीतिक दलों नें आंदोलन और तेज कर दिया और डूब क्षेत्र में बाहरी लोगों के प्रवेश पर प्रतिबंध लगा दिया. जिसके बाद एक फरवरी को विरोध के दौरान गोलियां चली और आठ ग्रामीण शहीद हो गये थे. आज भी एनएचपीसी के क्वार्टर तोरपा में बने हुए हैं जिसपर स्थानीय लोग रह रहे हैं. ग्रामीणों के विरोध को देखते हुए सरकार ने इस परियोजना से अपने हाथ खड़े कर लिये. लेकिन अब भी इस परियोजना को बंद नहीं माना जा सकता है. 

photo by Pawan 
जिन सवालों को लेकर परियोजना को बंद कराया गया था वो सवाल अब भी अनसुलझे हैं. पर्यावरण कि जिन चिंताओं को लेकर इस पर सवाल खड़े हुए थे आज भी उनका जवाब नहीं मिल पाया है. जिसके कारण सरकार का यह कदम कई सवाल खड़े करता है. पर्यावरण के लिहाज से देखा जाये तो यह काफी खतरनाक साबित हो सकता है. क्योंकि इसके निर्माण से कई गांव डूब जायेेंगे. लाखो हेक्टेयर के वनक्षेत्र बर्बाद हो जायेेंगे. लाखों की संख्या में ग्रामीण विस्थापित होगे, यह वो ग्रामीण है जिनकी दिनचर्या ही जंगल से शुरु होती है और जंगलों से वो बेतहाशा प्यार करते हैं.

पूर्वजों को अपने साथ-अपने पास रखने की अनोखी परंपरा, ताकि हमेशा आने वाली पीढी पूर्वजों को रखे याद और उन्हें मिलता रहे आशीर्वाद 
photo by Pawan 

ग्रामीणों का अपना बसा-बसाया समाज खत्म हो जायेगा. इनके साथ इनकी समृद्ध संस्कृित खत्म हो जायेगी. इनका अधिकार खत्म हो जायेगा. और विस्थापित होने के बाद सभी ग्रामीण मजदूर बन जायेंगे. सरकार को इस दूसरी तस्वीर को भी देखना होगा. इलाके के बड़े ही शांत स्वभाव और सीधे होते हैं इनकी परंपरा समाप्त हो जायेगी.  

पूर्वजों को अपने साथ-अपने पास रखने की अनोखी परंपरा, ताकि हमेशा आने वाली पीढी पूर्वजों को रखे याद और उन्हें मिलता रहे आशीर्वाद

stones at Lohajimi Village Torpa                 Photo: Pawan Singh Rathore   
आदिवासी समाज के अंदर कई तरह की परंपराये चलती है जिसके अलग-अलग जगहों पर अलग-अलग मायने होते हैं. मै इस समाज के इतिहास के बार में तो ज्यादा जानकारी नहीं रखता हूं पर जो कुछ समाज में आदिकाल से चला आ रहा उसे अपने चश्मे से देखकर उसका विश्लेषण कर रहा हूं हो सकता है मैं गलत भी हो जाउं क्योंकि मैं आज जो भी लिख रहा हूं वो जानकारी मैने सिर्फ मैने स्थानीय लोगों से बातचीत करके हासिल की है. क्योंकि मुझे यहां पर अपने बुजूर्गों के प्रति पूर्वजों के प्रति भावनात्मक लगाव दिखा वो अमूमन हमारे कथित आधुनिक और मशीनी समाज से धीरे-धीरे गायब होता जा रहा है शायद इसलिए ओल्ड एज होम में भीड़ बढ़ती जा रही है. 

name in stone at Lohajimi Village                                                                      photo: Pawan Singh Rathore
रिपोर्टिंग के सिलसिले में मैं खूंटी जिला के तोरपा प्रखंड गया था और वहां के झटिंगटोली और लोहाजिमी गांवों में गया. दोनो गांवो के बीच की दूरी बीस किलोमीटर से अधिक है. तोरपा प्रखंड मुंडा आदिवासी बहुल इलाका है और सांस्कृतिक तौर पर काफी समृद्ध है. यह मै अपने नजरिये के हिसाब से लिख रहा हूं, हो सकता है आपकी राय मुझसे अलग हो. इन दोनो ही गांवों में मैने उचें-उचें पत्थर देखा जो कृत्रिम तौर पर गाड़े गये थे, कुछ पत्थरों में नाम भी अंकित थे, 

अमूमन ऐसे पत्थर पांचवी अनुसूची वाले क्षेत्रों में रहते हैं जहां पर सविधान के मुताबिक पांचवी अुनसूची के आधार पर उन इलाकों को दी गयी विशेषाधिकार की जानकारी अंकित होती है, पर इन पत्थरों में नाम और तारीख लिखे हुए थे. पुछताछ के बाद ग्रामीणों ने बताया कि घर के अगर बुजूर्ग की मौत होती है तो उसे दफना दिया जाता है और फिर एक साल बाद दफनाएं गए जगह से हड्डी को लाकर घर के पास ही गाड़ दिया जाता है और उसके उपर पत्थर गाड़ दिया जाता है. 

ग्रामीणों ने बताया कि इस दौरान उस घर में शादी जैसा माहौल रहता है और पूरे रीति रिवाज से सारे काम होते हैं. इतना कुछ कार्यक्रम होते है लेकिन इसके पीछे एक बात तो तय है जो सामने आती है वो है सम्मान, इस प्रक्रिया से मुझे यह बात समझ में आयी की समाज के लोग अपने बुजूर्गो को हमेशा अपने पास रखना चाहते हैं. उनका कहना है कि ऐसा करने से वो हमेशा हमारे सामने रहते है साथ ही हमारे आने वाली पीढ़ियां भी उन्हें जान पाती है और कई पुश्तों तक हमारी पहचान बनी रहती है. यह प्रेम सिर्फ इसी समाज में देखने के लिए मिलता है, इस इलाके के गांवों में हर घर के बाहर आपको ऐसे पत्थर दिख जायेंगे. 

Sight of Starting of Saranda forest  Photo: Pawan Singh Rathore
प्राकृतिक तौर पर कुदरत ने इस इलाके को अतुलनीय खूबसुरती दी है. उंचे-उचें पहाड़ है इसके और सांरडा के घने जंगलो की शुरुआत है. फिजाओं में खामोशी है और अदभूत संस्कृति की पहचान के साथ माटी की खुशबू है. गांवो तक जाने के लिए सड़के हैं. फटका पंचायत का लोहजिमी गांव खूटी और पश्चिमी सिंहभूम के बीच का सीमावर्ती गांव है, गांव  के बाद  से पहाड़ और सारंडा के घने जंगलो की शुरुआत होती. कभी यहां के फिजाओं में बंदूको का शोर था लेकिन अब धीरे-धीरे हालात काबू में आ रहे हैं. कई ऐसी कहानीयां है जिन्हे देखने की और समझने की जरुरत है.