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Friday, 21 September 2018
Tuesday, 11 September 2018
'नो एफआईआर नो अरेस्ट फैसला ऑन द स्पॉट'....क्या लोग अपने हाथ में न्याय लेकर चलना चाहते हैं......
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'नो
एफआईआर नो अरेस्ट फैसला ऑन द स्पॉट' यह फिल्मी डॉयलॉग सन 2002 में आयी
फिल्म 'क्रांती' में अभिनेता बॉबी देवल ने दिया था. उस वक्त किसी ने यह
नहीं सोचा होगा की फिल्म का यह डॉयलॉग एक दिन हकीकत बन जायेगी. हां आज समाज
में यह हकीकत है कि भीड़ हिंसा पर उतारू है. ऐसा नहीं है कि भीड़ की हिंसा
भारत के लिए कोई नयी बात है. पहले भी रंगे हाथ पकड़े जाने पर अपराधियों को
बलि चढ़ जाती थी. बदलते समाज या यूं कहे ज्यादा पढ़े लिखे समाज ने इसके
लिए एक नया नाम गढ़ लिया 'मॉब लींचिंग'. पर क्या समाज में हिंसा जायज है,
या हम एक ऐसे समाज में जी रहे हैं जहां हर व्यक्ति की जान खतरे में है.
जहां एक छोटी सी गलती आपको समझने का मौका नहीं देती है. भीड़ के पास एक
हजार हाथ तो होते हैं लेकिन उनमें से एक भी संवेदनशील व्यक्ति का दिल नहीं
होता है. एक भी कान नहीं होते हैं जो हिंसा का शिकार हो रहे शख्स की बात को
सुन सके, या फिर हर कोई उस भीड़ में भीड़ का हिस्सा हो जाता है. सवाल बहुत
है.
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क्या आम जनता गुस्सैल हो चली है?
पहला सवाल यह है कि आखिर आम जनता के दिमाग में इतना गुस्सा कहां से आ रहा है, क्यों आ रहा है. क्योंकि अगर आप रोज की दिनचर्या में देखे तो सब लोग आपको रोजी-रोटी कमाने की जुगत में भागते हुए दिखाई देते हैं. तो क्या नाराजगी काम को लेकर है, या आगे ना बढ़ पाने की है. चलिये किसी ने अपराध कर दिया, या करते हुए पकड़ा गया तो भीड़ ने उसे गुस्से से मारा और इस दौरान उसकी मौत हो गयी, मान लिया लेकिन उनका क्या जो घूमते फिरते या किसी मोहल्ले में खड़े पाये गये और भीड़ के शिकार हो गये. हालात यह है कि अगर आप बाइक से जा रहे हैं सामने कोई ऑटो, रिक्शा या साइकिल आ जाये, फौरी तौर पर जुबान से मां और बहन की गाली निकलती है. इसलिए अगर आप यह सोच रहें है कि आप बचे रहे हैं तो, आप गलत सोच रहें है. आपके आस-पास में ही मॉब लिंचिंग करने वाला दिल दिमाग और हाथ घूम रहा है जो कभी भी बेकाबू हो सकता है.
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लोग अपने हाथ में न्याय लेकर चलना चाहते हैं
बचपन
से हम फिल्मों में एक डॉयलॉग सुनते आये हैं, कि कानून अपने हाथ
में नहीं लेना चाहिए, तो आज लोग काननू तो हाथ में लेकर क्यों चल रहे हैं,
क्या यह मन में दबा वो आक्रोश है जो दशकों से जनता देख रही है समझ रही है,
क्या जनता को न्यायपालिका और पुलिस से विश्वास कम हुआ है. क्योंकि सच्चाई
तो यह भी है कि एक मामले पर फैसला आते-आते कई साल लग जाते हैं, कई मामलों
में पीड़ित को न्याय नहीं मिल पाता है. पैसे और रूतबे के दम पर फैसले पलट
दिये जाते हैं. तो क्या मॉब लिंचिग इन सभी की अभिव्यक्ति है कि आम आदमी सोच
रहा है कि पुलिसिया पूछताछ, थाने के चक्कर, कोर्ट के चक्कर और वकील की फीस
देने से अच्छा है कि फैसला ऑन द् स्पॉट कर दिया जाये.
अपराध की श्रेणी में आया बदलाव
अपराध का दायरा, अपराध के तरीके और अपराधियों की प्रवृति भी बढ़ी है, अलग-अलग हुई है. पहले सिर्फ लूटपाट, डकैती, हत्या जैसी घटनाएं होती थी, पर अब बलात्कार जैसे अपराध आम हो गये हैं, यहां तक की मासूम बच्चियों तक से इस तरह की घटना को अंजाम दिया रहा है, जिसे अपने समाज और अपने आस-पास में होते देख जन मानस के अंदर एक गुस्सा है, जो अपराधियों को देखते ही फूट पड़ता है, शायद भीड़ यह सोचता है कि अगर अपराधी ही नहीं रहेंगे तो अपराध कैसे होगा, भीड़ का मकसद यह भी होता होगा की अपराधियों के इस तरह के अंजाम को देख कर अपराधी डर जाये सुधर जाये. लेकिन इतना तो तय है कि कानून का डर अब ना अपराधियों को है और ना ही हत्या करने वाली भीड़ को. यह हमारे समाज के लिए एक चिंता का विषय है.
आंकड़े
जुलाई 2018 के आकडों के मुताबिक 4 साल में मॉब लिंचिंग के 134 मामले सामने आये.
20 मई 2015,
राजस्थानमीट शॉप चलाने वाले 60 साल के एक बुज़ुर्ग को भीड़ ने लोहे की रॉड और डंडों से मार डाला
2 अगस्त 2015
उत्तर प्रदेशकुछ गो रक्षकों ने भैंसों को ले जा रहे 3 लोगों को पीट पीटकर मार डाला
28 सितंबर 2015 दादरी, यूपी
52 साल के मोहम्मद अख्लाक को बीफ खाने के शक़ में भीड़ ने ईंट और डंडों से मार डाला
14 अक्टूबर 2015 हिमाचल प्रदेश22
साल के युवक की गो रक्षकों ने गाय ले जाने के शक में पीट पीटकर हत्या कर दी
18 मार्च 2016 लातेहर झारखंड
मवेशियों को बेचने बाज़ार ले जा रहे मज़लूम अंसारी और इम्तियाज़ खान को भीड़ ने पेड़ से लटकाकर मार डाला
5 अप्रैल 2017 अलवर राजस्थान
200 लोगों की गो रक्षक फौज ने दूध का व्यापार करने वाले पहलू खान को मार डाला
20 अप्रैल 2017 असम
गाय चुराने के इल्ज़ाम में गो रक्षकों ने दो युवकों को पीट पीटकर मार डाला
1 मई 2017 असम
गाय चुराने के इल्ज़ाम में फिर से गो रक्षकों ने दो युवकों को पीट पीटकर मार डाला
12 से 18 मई 2017 झारखंड
4 अलग अलग मामलों में कुल 9 लोगों को मॉब लिंचिंग में मार डाला गया
29 जून 2017 झारखंड
बीफ ले जाने के शक़ में भीड़ ने रामगढ़ में अलीमुद्दीन उर्फ असग़र अंसारी को पीट पीटकर मार डाला
10 नवंबर 2017 अलवर राजस्थान
गो रक्षकों ने उमर खान को गोली मार दी जिसमें उसकी मौत हो गई
20 जुलाई 2018 अलवर राजस्थान
गाय की तस्करी करने के शक में भीड़ ने रकबर खान को पीट पीटकर मार डाला
हलांकि इन घटनाओं के बाद बिहार और महाराष्ट्र से भी मॉब लिंचिग की खबरे सामने आयी.
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लोग अपने हाथ में न्याय लेकर चलना चाहते हैं: डॉ श्रिंक सिद्धार्थ सिन्हा
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| Dr. Shrink Siddharth Sinha |
रिनपास
के विशेषज्ञ मनोचिकित्सक डॉ श्रिक सिद्धार्थ सिन्हा मानते है कि भीड़ की
मानसिकता एक अकेले व्यक्ति की मानसिकता से अलग होती है. भीड़ की हिंसा भारत
में कोई नयी बात नहीं है लेकिन अब इसे मॉब लिंचिग का नाम दे दिया गया है.
पुराने जमाने में भी अगर कोई अपराधी मौके पर पकड़ा जाता था तो शायद ही वो
बच जाता था. यह जो मानसिकता उभर कर आयी है कि लोग अपने हाथ में न्याय लेकर
चलते है, गुस्सा बहुत होता है लेकिन यह गुस्सा तब और फूट जाता है जब अपराध
की श्रेणी भी जघन्य हो, बलात्कार जैसी घटनाएं इसमें शामिल है. इस तरह की
घटनाओं में हर आदमी फौरी तौर पर न्याय चाहता है, जो अपराधी इस तरह का अपराध
करते है तो उन्हें इस गुस्सा का सामना करना पड़ता है. ऐसे मामले में अपराध
तुरंत तय हो जाते हैं और फैसला हो जाता है. ऐसे घटनाओं में एक व्यक्ति का
गुस्सा दूसरे व्यक्ति से मिलता है और इस तरह भीड़ का गुस्सा भयावह रूप ले
लेता है.
अध्यात्म से दूर हो रहा है समाज: ज्योतिषाचार्य श्रीपति त्रिपाठी
अध्यात्म से दूर हो रहा है समाज: ज्योतिषाचार्य श्रीपति त्रिपाठी
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| Sripati Tripathi |
ज्योतिषाचार्य श्रीपति त्रिपाठी मानते है कि जिस तरह हमारे घर में हमारे माता पिता हमें सही राह दिखाते हैं उसी तरह धर्म और अध्यात्म इंसान को एक संयमित और बेहतर जीवन जीना सिखाता है. पर अब इंसान अध्यात्म से दूर होता जा रहा है. धर्म अधर्म का फैसला नहीं कर पा रहा है. दिमाग को नियंत्रित नहीं कर पा रहा है क्योंकि धर्म, आस्था से उसका भटकाव हो रहा है. अच्छी धार्मिक और ज्ञान की पुस्तकें नहीं पढ़ रहा है जिसके कारण उसके दिमाग में एक खालीपन भर रहा है जो इंसान को भटकाव के रास्ते पर ले जा रहा है.
Saturday, 8 September 2018
यह चुभन सिर्फ हाथों में नहीं थी मेरे दिल में भी थी, लेकिन तुम्हारी डबडबाई आंखे उस वक्त देख नहीं पायी
तुम मुझे कभी समझ नहीं पाओगे..... मुझे याद है
जब तुम मुझसे आखिरी बार मिलने आये थे तब तुमने आंखों में आसुं भरकर सिर्फ
यही बात कह पायी थी. सच बताऊं तो उस दिन भी मैं तुम्हे जाने नहीं देना
चाहता था. जी में आया कि पूरी ताकत से तुम्हारा हाथ थाम लूं, मैने पकड़ा भी
लेकिन तुम्हारे हाथ की अंगूठी मुझे चुभ रही थी. यह चुभन सिर्फ हाथों में
नहीं थी मेरे दिल में भी थी, लेकिन तुम्हारी डबडबाई आंखे उस वक्त देख नहीं
पायी. तुम्हारे जाने के बाद देर शाम तक मैं वही खड़ा था. मुझे उम्मीद थी कि
तुम जरूर आओगे,पर तुम नहीं आये. जानते हो उस रात रातभर रूक-रूक बारिश हो
रही थी.
आज फिर वही 16 तारीख है, शुक्रवार की शाम है लगभग साढ़े पांच बज
रहा है. आज पूरे 4 साल 6 महिने और 26 दिन बाद तुम मुझसे मिलने आ रहे
हो. मेरे मन में कई तरह के सवाल है. इतने दिन तुम कहां थे, क्या किए. आज
तुमने मुझे क्यों बुलाया है...इन सब बातों को सोचते सोचते मैं कब यादों में
चार चार साल पीछे चला गया मुझे पता ही नहीं चला. अपनी शहर की ऐसी कोई सड़क
नहीं बची थी जहां हमदोनो घुमे नहीं थे, तुम्हें हमेशा सबसे स्वादिस्ट चाट
खाने की जिद रहती थी और इस चक्कर में हम हर रोज शहर के बीसीयों चक्कर लगा
लेते थे.
यह भी पढ़ें: नीला वाला वो फूल नीलकंठ है, जो शिवजी को बहुत पसंद है, याद है तुमने ही मुझे पहली बार बताया था....
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सब कुछ तो ठीक था हमारे बीच, हां बाद के दिनों में मैं थोड़ा वक्त
कम देने लगा.क्या करता घर के जिम्मेदारियों का बोझ था,ऑफिस का प्रेशर था,
कम उम्र में ही समझदार बन गया. ऑफिस से थककर आता और तुम रात में बात करने
की जिद करती....काश उस वक्त मैं तुम्हें समझा होता, तो तेरे बगैर ना जाने
कितनी रातें खिड़की के बाहर ताकते हुए नहीं बितानी पड़ती. मैं ख्यालों के
उधेड़बुन में खोया हुआ था और तुम मेरे सामने आयी..तुम तो बदल चुके थे. वो
अगुंठी जो मुझे चुभी थी वो तुम्हारे इंगेजमेंट की थी...
Wednesday, 29 August 2018
आज फिर रास्ता काट गई...यार आज तक तुम्हारे काटने-पीटने की आदत नहीं गयी ना....
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कसम से बड़ी तसल्ली होती, इंगेजमेंट के बाद बड़ी
नाच-नाच कर उस अंगुली में पहनी अंगूठी दिखा रहे थे. चिल्ला-चिल्ला कर उसका
दाम बता रहे थे, अपने होने वाले खड़ूस पति का नाम बता रहे थे. सच बताऊं तो
बड़ा गुस्सा आया था उस दिन. यार एक बताओ मैं जितनी बार तुमसे दूर जाने की
कोशिश करता हूं, उतनी ही हर बार मेरे सामने आ जाते हो रास्ता काटने के लिए
कहां से टपक पड़ते हो. पिछले महीने की 28 तारीख को बुधवार का दिन था, चिकन
खाने का जी कर रहा था, पैसे कम थे तो सड़क के किनारे ठेले पर चिकन पराठा
खा रहा था. जैसे ही पहला निवाला मुंह में डाला तुम सामने हाजिर. यार तुमने
क्या मेरे अंदर कोई ट्रैकिंग डिवाइस डाल कर रखा है जो हर जगह पहुंच जाते
हो. जब मैं शहर के सबसे बड़े मॉल में होता हूंतब तो
तुम नहीं आते हो, लेकिन जब भी फूटपाथ से कुछ खरीदने जाऊं तुम टपक जाते हो.
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Thursday, 16 August 2018
हार नहीं मानूंगा रार नयी ठानूंगा, काल के कपाल पर लिखता मिटाता हूं, गीत नया गाता हूं, गीत नया गाता हूं. अटल विचार, अटल व्यवहार, अटल व्यक्तित्व को अटल श्रद्धांजलि.
हार नहीं मानूंगा रार नयी ठानूंगा, काल के
कपाल पर लिखता मिटाता हूं, गीत नया गाता हूं, गीत नया गाता हूं. जन-मानस को झंकृत कर देने वाली यह आवाज हमेशा के लिए खामोश हो गयी, अभी तो आजादी के जश्न का रंग भी नहीं उतरा था किसे मालूम था की 16 अगस्त ऐसा
मनहूस खबर लेकर आयेगी. भारत रत्न, प्रखर कवि, शानदार राजनेता और
एक बेहतरीन नेतृत्व क्षमता रखने वाले देश के पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी
बाजपेयी का निधन हो गया. उनका जन्म 25 दिसंबर 1924 में ग्वालियर में हुआ
था. उन्होंने तीन बार बतौर प्रधानमंत्री देश का प्रतिनिधित्व किया था. 66
दिनों तक एम्स में जिंदगी की जंग लड़ने के बाद आखिर कार वो जिंदगी की जंग
हार गये. उनके किडनी और मूत्राशय में इंफेक्शन था. वो लाइफ सपोर्ट सिस्टम
पर चल रहे थे.
उन्होंने राजनीति को
दलगत और स्वार्थ की वैचारिकता से अलग हट कर अपनाया और उसको जिया. राजनीतिक
जीवन के उतार चढ़ाव में उन्होंने आलोचनाओं के बाद भी अपने को संयमित रखा.
राजनीति में धुर विरोधी भी उनकी विचारधारा और कार्यशैली के कायल रहे. पोखरण
जैसा आणविक परीक्षण कर दुनिया के सबसे ताकतवर देश अमेरिका के साथ दूसरे
मुल्कों को भारत की शक्ति का अहसास कराया. कविताओं को लेकर उन्होंने कहा था
कि मेरी कविता जंग का एलान है. राजनीतिक सेवा का व्रत लेने के कारण वे
आजीवन कुंवारे रहे. उन्होंने राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के लिए आजीवन
अविवाहित रहने का निर्णय लिया था. अटल बिहारी वाजपेयी ने अपनी राजनीतिक
कुशलता से भाजपा को देश में शीर्ष राजनीतिक सम्मान दिलाया. दो दर्जन से
अधिक राजनीतिक दलों को मिलाकर उन्होंने राजग बनाया जिसकी सरकार में 80 से
अधिक मंत्री थे. जिसे जम्बो मंत्रीमंडल भी कहा गया. इस सरकार ने पांच साल
का कार्यकाल पूरा किया.
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अटल बिहारी वाजपेयी राजनीति में कभी भी आक्रमकता के
पोषक नहीं थे. वैचारिकता को उन्होंने हमेशा तवज्जो दिया. पत्रकारिता ही
उनके राजनैतिक जीवन की आधारशिला बनी. उन्होंने संघ के मुखपत्र पांचजन्य,
राष्ट्रधर्म और वीर अर्जुन जैसे अखबारों का संपादन कियाण. 1957 में देश की
संसद में जनसंघ के सिर्फ चार सदस्य थे जिसमें एक अटल बिहारी वाजपेयी भी थे.
संयुक्त राष्ट्र संघ में भारत का प्रतिनिधित्व करते हुए हिंदी में भाषण
देने वाले अटलजी पहले भारतीय राजनीतिज्ञ थे. उन्होंने सबसे पहले 1955 में
पहली बार लोकसभा का चुनाव लड़ा लेकिन उन्हें पराजय का सामना करना पड़ा. बाद
में 1957 में गोंडा की बलरामपुर सीट से जनसंघ उम्मीदवार के रूप में जीत कर
लोकसभा पहुंचे.
इंदिरा गांधी के खिलाफ जब विपक्ष एक हुआ और बाद में जब देश
में मोरारजी देसाई की सरकार बनी तो अटल जी को विदेशमंत्री बनाया गया. इस
दौरान उन्होंने अपनी राजनीतिक कुशलता की छाप छोड़ी और विदेश नीति को
बुलंदियों पर पहुंचाया. बाद में 1980 में जनता पार्टी से नाराज होकर पार्टी
का दामन छोड़ दिया इसके बाद बनी भारतीय जनता पार्टी के संस्थापकों में
वह एक थे. उसी साल उन्हें भारतीय जनता पार्टी के अध्यक्ष की कमान सौंपी
गयी. इसके बाद 1986 तक उन्होंने भाजपा अध्यक्ष पद संभाला. उन्होंने इंदिरा
गांधी के कुछ कार्यों की तब सराहना की थी, जब संघ उनकी विचारधारा का विरोध
कर रहा था. कहा जाता है कि संसद में इंदिरा गांधी को दुर्गा की उपाधि
उन्हीं की तरफ से दी गई.
अटल हमेशा से समाज में समानता के पोषक रहे. अटल जी
ने लालबहादुर शास्त्री जी की तरफ से दिए गए नारे जय जवान जय किसान में अलग
से जय विज्ञान भी जोड़ा. देश की सामरिक सुरक्षा पर उन्हें समझौता गवारा
नहीं था. वैश्विक चुनौतियों के बाद भी राजस्थान के पोखरण में 1998 में
परमाणु परीक्षण किया. देश को परमाणु शक्ति से लैस करने वाले वो महान व्यक्तित्व अब हमारे बीच नहीं रहे. यह देश अटल जी को हमेशा याद रखेगा. उन्हें विन्रम श्रद्धांजलि, आप हमारे दिल में रहेंगे. अलविदा अटल जी.
Monday, 13 August 2018
नीला वाला वो फूल नीलकंठ है, जो शिवजी को बहुत पसंद है, याद है तुमने ही मुझे पहली बार बताया था....
सावन का महीना था, सुबह से ही बारिश हो रही थी. पता नहीं क्यों आज
बहुत दिनों बाद सोचा कि मंदिर हो आंऊ, वैसे भी भगवान से रिश्ता टूटे हुए
कई बरस बीत चूके थे. पर आज मन हुआ कि मंदिर जाकर भगवान को इस जिंदगी
के लिए शुक्रिया बोल कर आंऊ. थोड़ी बारिश कम हुई तो बिना छाता लिए ही घर से
मंदिर के लिए निकल गया. सोचा उस पहाड़ी वाली शिवजी के मंदिर जांऊ, जहां
आखिरी बार तुमने मुझे अलविदा कहा था.
आज कई बरस बाद उस मंदिर की सीढ़ियां
चढ़ रहा था, पर आज मन हल्का था, सीढ़ी चढ़ते हुए एक- एक पड़ाव पार कर रहा
था. जैसे-जैसे सीढ़ियां चढ़ता जा रहा था, आंखों के सामने से वो तुम्हारे
साथ बीताये गये आखिरी पल सिनेमा स्क्रिन की तरह नाच रहे थे. बारिश
से सीढ़ियां भी गीली हो रही थी और मेरे अंदर की बारिश से मैं भी गीला हो
रहा था, आधी सीढ़ियां चढ़ जाने के बाद तो मुझे लगा जैसे मैं यह क्या कर
रहां हूं, मुझे वापस चले जाना चाहिए, लेकिन मन के अंदर से ही आवाज आयी की
आखिर कब तक भागोगे खुद से सामना करो इस सच का कि जिसके लिए तुम सबकुछ छोड़
चुके हो वो अपनी जिंदगी में सबकुछ हासिल कर रही
है. उसने तुम्हारे लिए क्या छोड़ा जो तुम उसके लिए छोड़ रहे हो, डरे हुए
मेरे मन ने धीरे से जवाब दिया, प्यार भी तो मैने ही किया था. इस उधेड़बुन में
कब मंदिर की सीढ़ियां चढ़कर मुख्य मंदिर में पहुंच गया पता ही नहीं चला,
शिवलिंग पूरा नीले पीले लाल और सफेद फूलों और बेलपत्र से ढंका हुआ था. नीला वाला वो फूल नीलकंठ है, जो शिवजी को बहुत पसंद है, याद है तुमने मुझे पहली बार बताया था
मैं पूजा करने लगा, ऐसा लग रहा था मेरे मन का गुस्सा फूट कर बाहर निकलने
वाला है, और भगवान मुझे सांत्वना दे रहे हैं कि जो हुआ सो हुआ अब आगे बढ़
जाओ, पर कैसे बढ़ूं, इस मंदिर की सीढ़ियां भी तो मैने पहली बार उसके साथ ही
पार की थी. मैं अगरबत्ती जलाने लगा, मुझे याद आया कि हर बार अगरबत्ती मैं
पकड़ता था और माचिस तुम जलाते थे, पर आज मैं अकेला था. पूजा करने के बाद
मंदिर के नीचे गया जहां पर नारियल फोड़ने के लिए स्थान बना आ था, तुम
मुझे अक्सर कहती थी कि नारियल एक बार फोड़ना चाहिए, मैने एक बार में
नारियल फोड़ा. आज पहली बार मैने भगवान से पूजा में तुम्हें नहीं मांगा.
पूजा करने के बाद मैं सीढ़ियों से नीचे आ रहा था. मैं उतरते हुए उस मोड़ पर
पहुंचा जहां से हमलोग अलग हो गये थे, मैं उस मोड़ पर पहुंचा तो
मेरी धड़कने अचानक तेज हो गयी, ये वहीं अहसास था जब तुम सामने होती थी, तो
क्या आज फिर तुम आस-पास हो, आगे बढ़ा तो देखा सच में तुम आ रही थी. सर पर
दुपट्टा और हाथों में पूजा की टोकरी, कितने बरस बीत गये थे
आज तुमको देखा, तुम उतनी ही सुंदर लग रहे थे. हां बीतते हुए
वक्त ने तुम्हारे बालों और चेहरे में अपनी छाप छोड़ दी थी. मैं तुम्हें देख
ही रहा था कि तुम नजर झुकाये मेरे सामने से गुजर गये तुमने तो मुझे देखा
भी नहीं, क्या इतना बदल गये थे तुम, अपनी जिंदगी में आगे बढ़ते हुए तुम
सीढ़ियों से उपर जा रहे थे, और मैं वहीं पर खड़ा तुम्हें देख रहा था.
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तुम्हारे इस तरह चले जाने से मेरे पैर जड़ हो गये थे लेकिन पता नहीं अचानक
मेरे पैर में कहां से जान आ गयी और मैं बेतहासा सीढ़ियों से उपर भागा, मुझे
लग रहा था मैं तुम्हें रोक कर पूंछु की इतने साल तुमने क्या किया, क्या एक
बार भी तुम्हें मेरी याद नहीं आयी. तबतक हम दोनों उसी शिवलिंग के सामने
थे. हाथ जोड़कर आंखे बंद किये पता नहीं क्या मांग रहे थे. तुम्हें ऐसे देखकर हमेशा मैं कहता था कि तुम कितनी सुंदर दिख रही हो, क्या तुम आज वही सुनने की कोशिश कर रहे थे. माफ करना लेकिन आज मैं नहीं कह सकता था, जमाने
और अपने ही प्यार की कसम ने मुझे रोक रखा था, और कहता भी तो कैसे तुम्हारे
ठीक बगल में तुम्हारे पति तम्हारे बच्चे को गोद में लिए बता रहे थे, यह
नीला फूल नीलकंठ है, यह भगवान शिव को बहुत पसंद है. उसके बाद तुम्हारे पति
ने अगरबत्ती पकड़ा और तुमने माचिस से अगरबत्ती जलायी. मैं तो अकेले
अगरबत्ती जलाना सीख गया, पर तुम आज तक नहीं सीख पाये. अपने पति में तुमने
मेरा अक्स तो देख लिया लेकिन मैं किसी में तुम्हें नहीं देख पाया.
फिर मैं
मंदिर से सीढ़ियां उतरने लगा, मुझे यह यकीन हो गया था कि वाकई अपनी जिंदगी
में तुम आगे बढ़ गये हो. पर मैं उसी मोड़ जाकर रुक गया, कुछ देर बाद तुम
उसी जगह पर थे, उसी बेंच पर उसी जगह बैठकर ऊंचाई से नीचे देख रहे थे.
मैंने नजर बचाकर तम्हें देखा, तुम अकेले थे, और तुम्हारें आखों के रास्ते
तुम्हारा सब्र गालों पर उतर रहा था, तुम उसे छिपाने की नाकाम कोशिश कर रहे
थे. धीरे-धीरे बारिश बढ़ रही थी, और मैं सीढ़ियों से नीचे उतर रहा था...
Friday, 10 August 2018
जिनका बचपन पांच इंच के स्मार्टफोन और 32 इंच की एलइडी टीवी के साथ बीत रहा है वो कैसे होंगे...
कहां भागे जा रहे हो ? थोड़ा रुको, संभलों, नहीं अभी
समय नहीं है. अभी समय नहीं है का तात्पर्य क्या है, कि हमे इतने रफ्तार में
आगे बढ़े, आगे जाये की सब कुछ पीछे छूट जाये, हमें गिरने का डर नहीं हो,
गिर कर चोट लगने का डर नहीं हो, पर वाकई में देखने से लगता है डर तो नहीं
है. अंधी दौड़ में सब कुछ पीछे छोड़ते हुए, ठीक उसी तरह जैसे बम फूटने के
बाद धुएं का गुब्बार क्षण भर में गायब हो जाता है.
आज इंसान भी वैसे ही
गायब होता जा रहा है. किसी को किसी के खोज खबर लेने की फुर्सत नहीं है. हम
सिर्फ और सिर्फ खुद में केंन्द्रित होते जा रहे हैं. आत्ममुग्धता अच्छी बात
है, लेकिन यह उतनी ही बुरी बात है अगर सिर्फ खुद के लिए सोचा जाये.
जिंदगी में भागदौड़ अच्छी बात है, आगे बढ़ने की होड़ अच्छी बात है. यह सच
है कि जीवन बदला है, जीने का तरीका बदला है, पर बदलते जीवन में हम अपने
पौराणिक परंमपराओ की बलि चढ़ा दे यह तो पूरी तरह अनैतिक है.
अब छोटे बच्चों
में अपना बचपन नहीं दिखाई देता है. ना वो बचपना दिखता है, ना वो अल्हड़पन
दिखता है. कहां खो गये सब, कहीं ऐसा तो नहीं कि हमने अपने बचपन को जी लिया
और उसकी लिखावट को हमेशा के लिए मिटा दिया ताकि कोई उसे पढ़ नहीं सके. या
फिर हम वो माता-पिता नहीं बन पा रहे हैं, जैसे हमारे है, या हमारे
माता-पिता वो दादा-दादी, नाना, नानी नहीं बने पा रहे हैं जैसे हमारे थे. यह
सोचने वाली बात है कि हमारी पीढ़ी में हमने जो सीखा वो अपने बाद की पीढ़ी
का बता नही पाये तो हमारे बाद वाली पीढ़ी क्या बता पायेगी. यह सच है.
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हमारा
बचपन घर से ज्यादा स्कूल, खेल का मैदान, खेत खलिहान में बीता तब हम ऐसे हो
गये हैं, जरा सोचिये कि जिनका बचपन पांच इंच के स्मार्टफोन और 32 इंच की
एलइडी टीवी के साथ बीत रहा है वो कैसे होंगे. माना आगे बढ़ना है,लेकिन इतने
आगे मत बढ़ जाइए की आप अकेले हो जाये और फिर सब कुछ हासिल होने के बाद भी कुछ ना हो.
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