Monday, 16 December 2019

इनकी जिंदगी हमेशा के लिए गरीबी के अंधेरे से बाहर निकल जायेगी या फिर..... धीरे धीरे शोर और रोशनी फिर से अंधेरे में गुम हो जायेगी.




Pole malkambh Pic By Pawan Kumar
पास के एयरपोर्ट से उड़ते हवाई जहाज, सपनों की ऊंची उड़ान को पंख दे रही है. तो आसमान के रोशनी रहते दुधिया चमक के साथ निकल आया चांद पूरे आसमान में अपनी चमक छोड़ देने का हौसला प्रदान करता है, और जब बाते आसमान से हो रही हो, बराबरी आसमान से हो रही हो, तो नीचे जमीन की क्या मजाल की आसमान में उड़ रहे सपने को रोक सकेें. पर ऐसा नहीं है कि नीचे पर कतरने के प्रयास नहीं हो रहे हैं. इस प्रयास में मैदान में मौजूद छोटे-छोटे मच्छर भी कुपोषित शरीर से खून चूसने की फिराक में लगे हैं. कुपोषित शरीर खो-खो और मलखम्भ के खिलाड़ियों के हैं. इन्होंने अपनी जीतोड़ मेहनत करके देश राज्य और जिले का नाम तो रोशन कर दिया है, लेकिन इन्हें इस हाल से ऊबारने वाला कोई नहीं है. खेल के मानको के आधार पर निर्धारित भोजन भले ही इन्हें नसीब नो हो पर इनके हिस्से में मेडल जरूर है

कहने के लिए रांची के जगन्नाथपुर थाना के पीछे यह डे बोर्डिंग सेंटर है पर ना खुद का मैदान है ना कोई कमरा है, जहां पर खिलाड़ी अपने सामान रख सकें. सेंटर में ना पानी की व्यवस्था है और ना ही शौचालय की. हां एक समतल जमीन है. एक कोच है. मलखंभ के नाम पर एक खूंटा है. रोप मलखंभ के नाम पर आम पेड़ की डाली से लटकी एक रस्सी है. इतनी कमियों के बीच यहां के खिलाड़ी दिल्ली तक अपनी धाक जमा चुके हैं. बच्चियां झारखंड मलखंभ क्वीन का अवार्ड जीत चुकी हैं. छत्तीसगढ़ और गोवा में अपने खेल का प्रदर्शन कर चुके हैं. खो-खो में भी यहां के बच्चों को बेहतरीन प्रदर्शन रहा है

Rope Malkambh Pic BY Pawan Kumar
लगभग सभी बच्चे ऐसे परिवारों से आते हैं जो अपने बच्चों को क्रिकेट खेलने के लिए कीट खरीद कर नहीं दे सकते हैं. डॉक्टर या इंजीनियर बनाने के लिए पैसे नहीं दे सकते हैं. ऐसे परिवारों के बच्चे एक ऐसा खेल खेलते हैं जिसमें सबसे ज्यादा स्टेमिना की जरूरत पड़ती है. मैदान में जरा सा कमजोर हुए और हार पक्की है. रोप मलखंभ एक ऐसा खेल है जिसमें रस्सी के सहारे झूलकर जमीन पर करने वाले सभी प्रकार के योग क्रियायें की जाती है. कुल 80 प्रकार के योग होते हैं. इसके लिए डेढ़ या फिर दो मिनट का समय होता है. पलक झपकते ही योगमुद्रा बदलनी पड़ती है, वो भी आसमान में लटक कर. चैंपियनशिप के दौरान तो गिरने पर चोट से बचाने के लिए मोटे-मोटे गद्दे होते हैं, पर यहां अभ्यास के दौरान जब सबसे अधिक जरूरत होती है तो नीचे सख्त जमीन गर्दन तोड़ने के लिए तैयार रहती है

Rope Malkambh Pic By Pawan Kumar
पोल मलखंभ में पोल के सहारे की योग क्रिया करनी पड़ती है. इसमें भी गिर जाने पर खतरा कम नहीं है. पर जान-जोखिम में डालकर खेलने वाले इन 10-15 साल के बच्चों को क्या मिलता है, बस उन्हें खुद का सुकून. पर इसके भरोसे पेट नहीं भरता है. जिस राज्य में सिर्फ चुनाव के नाम पर 500 करोड़ रूपये खर्च कर दिये जाते हैं, उस राज्य की राजधानी में इस खेल को खेल रहे बच्चे किसी तरह अपना पेट भरते हैं. इनमें से एक ऐसा बच्चा भी है जो दिन में स्कूल जाता है. शाम में अभ्यास करता है और फिर फूटपाथ पर अपनी चाय-पकौड़ी की दुकान संभालता है. बच्चों के खेल और कौशल को देखते हुए चांद की चमक और बढ़ गयी है. आसमान में उड़ रहे हवाई जहाज का सिर्फ शोर और जगमग रोशनी दिखाई दे रही है. एक सवाल लेकर बच्चों के साथ मैं भी वहां से निकल जाता हूं. क्या रात ढलते ही चांद की बढ़ती चमक की तरह इनकी जिंदगी हमेशा के लिए गरीबी के अंधेरे से बाहर निकल जायेगी या फिर हवाई जहाज के शोर और लाल रोशनी की तरह कुछ दूर जाकर धीरे धीरे शोर और रोशनी फिर से अंधेरे में गुम हो जायेगी




Pole Malkambh Pic by Pawan Kumar


Thursday, 4 April 2019

हाम तो पेपर में पइढ़ रही की सत्ता कुर्सी कर खेल होवेला तो इ चौकी आउर चौकीदार बीच में कहां से आय गेलक




आपन गरू छगरी के गोहार घर में ढुकाय के मंगरा बूढ़ा कुइंया में हाथ-गोड़ धोय के आपन पीड़ा में बैइठ के चीनी चाय पीयत रहे. सांझ कर बेरा रहेभइर दिन कर रौदाल मंगरा के थाकल नियर लागत रहे से ले मने मन एकाइगो संग भी खोजत रहे कि कई मिलबैं तो चरिया घर जाय के एकाइ गो हड़िया पीयबमंगरा आपन  पीड़ा में बैइठ के इ सोचत रहे, तखने करिखा लखे करिया मुंह लेके थाकल हारल  जागे आय गेलक

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मंगरा उके देइख के कहलक की कहां रे जागे कहां जाय रहिस आइज गरू चराय भी नई आले. तो जागे कहलक की रांची जाय रही बूढ़ाढइर दिन से खोखी ठिक नई होअत रहे थो जाय रही रिम्स में देखाय, एतई भीड़ रहे की का बताइउ. एतइ रोगी दुनिया में बइढ़ जा हथू. तोहिन जवान रहा से बेरा अइसन भीड़ होअत रहे. मंगरा कहलक की नई रे बाबू हामिन बीमार कम पड़त रहीदेसी खात पीयत रही लेकिन अब कर परिया में तो हवा बसात सभे बदइल गेलकहाइब्रिड कर चक्कर में देसी सिराय गेलक, से ले अब कर जवान छोड़ां मने भी फारम मुर्गी लखे होय जा हैं









जागे बीच में टोकलक आऊर कहलक इ सब बात के छोड़ इ बातव बूढ़ा किरांची में हाम एगो बड़का गो तिरपाल लखे कपड़ा देखलिअउ, जेके लोहा कर खूंटा में बाइंध दे रहथू. उकर में लिखल रहउ, मैं हूं चौकीदार. उकर में मोदी कर बड़का गो फोटो रहे. तुरंत मंगरा कहलक अरे हां रे आइज गांवों में आंय रहैं बीडीओ मने सबके वोट देवे कहले. कहत रहैं वोट जरूर देबे. तो जागे कहलक ठीके कहथीस बूढ़ा, हाम भी रेडियों में सुइन रही.  




फिर जागे कहलक लेकिन हामके इ समझ में नई आवथे कि चौकीदार काहे. हाम तो पेपर में पइढ़ रही की सत्ता कुर्सी कर खेल होवेला तो इ चौकी आउर चौकीदार बीच में कहां से आय गेलक. मंगरा कहलक हामिन कर जमाना में कुर्सी से काम चलत रहे,काहे कि सब कुछ कम रहे. अब सब कुछ ज्यादा होय गेलक से ले अब चौकीदार होय गेलेंय. आउर इकर फायदा भी है रे जागे, चौकी में बगरा जगह रहेला, जखन मन बैइठ, जखन मन सुत. जागे कहकल लेकिन इ बगरा ठांव मड़ियायला, तुंरत मंगरा कहलक अरे छोड़ा फायदा भी तो है इकर से


एखन तोय एक दिन में रांची घुइम के डॉक्टर के देखायके चइल आले, पइसा भी नई लागलऊ. रोड बनलऊ से ले नय. हामर देख पहिले नून चाय पियले ले भी एक कचा नय मिलत रहे अब देख चीनी चाय पियउला. राइत के अब अंधार में नय रहेक पड़उला, पक्का मकान देख बनथउ. अब राइत अंधार के डिब्बा लेके दोइन बटे नय जाइक पड़उला. जागे बीच में टोकाय के कहलक तो इकर से चौकी कर का संबंध हउ बूढ़ा. मंगरा कहलक सुन रे बाबू तखन से तोके एहे समझात रही... सेले अब कुर्सी नहीं चौकीदार हो. गोलक, काहेकि चौकी से ज्यादा फायदा है, चौकीदार से ज्यादा फायदा है. तखने जागे कर फोन में फोन आलक, जागे स्पीकर ऑन करलक तो आवाज आलक मै भी चौकीदार, फिर दुनो चरिया घर चइल गेलएं

Saturday, 16 March 2019

तुम्हारे बिना मैं एक कदम नहीं चल सकती थी, पर पूरी जिंदगी जीने के लिए निकल गयी



बाहर बारिश हो रही थी, इसलिए ऑफिस से नहीं निकल रहा था, सोच रहा था कि बारिश रूक जाये तब ही घर के लिए निकलूंगा. काम नहीं था तो फेसबुक पर कुछ पुराने मैसेजस पढ़ रहा था...तुम तो समझ गये होगे की वो मैजेस तुम्हारे ही रहे होंगे..तुम्हारी प्रोफाइल में जाकर तुम्हारे बारे में जानने की कोशिश कर रहा था.. प्रोफाइल देखा तो हर बार कि तरह वही तीन साल पहले अपलोड कि हुई तुम्हारी फोटो दिखी, जिसमें तुम अपनी बेटी और पति के साथ कहीं समुद्र के किनारे खड़े थे...पीछे दूर तक फैला समंदर था. उसके बाद की कोई एक्टीवीटि तुम्हारे प्रोफाइल पर नहीं थी. ऐसा लग रहा था मानों तुम्हारे पीछे दूर तक दिख रहा समंदर उठकर मेरे शहर में बादल बनकर आया है, और बरस रहा है. क्योंकि इस बार हर एक घंटे पर मौसम विभाग का पूर्वानुमान बदल रहा था. मुझे घर जाना था पर मैं फिर से पुराने दिनों में चला गया. 


मुझे याद है जब आखिरी बार तीन साल पहले हमारी बात पांच महीने तीन दिन बाद हुई थी तब तुमने कहा था कि तुम मुझे बहुत मिस करती हो और जवाब में मै कुछ नहीं कह पाया था, क्योंकि अचानक तुमने फोन काट दिया था..उसके बाद से आज तक तुम्हारा कोई फोन नहीं आया. मैं तुमसे कहना चाहता था कि हां मैं भी तुम्हे बहुत मिस करता हूं, पर तुमने सुनने से पहले ही फोन  रख दिया था पुराने मैसेजेस को पढ़ते हुए मैं तीन साल पहले चला गया था कि अचानक मेरा फोन बजा.. मैने देखा तो ट्रू कॉलर में तुम्हारा नाम दिखा..मैने फोन उठाया तो उधर से आवाज आयी, हैलो कैसे हो..मैं कुछ समझ पाता इससे पहले तुमने कहा कि तुम भूल गये हो मुझे, मैने कहा नहीं.....उसने पूछा कहां हो, मैने कहा ऑफिस में हूं. उसने कहा कि तुम्हारे शहर का तो हाल बेहाल है..बारिश ही बारिश..मैने सोचा, शहर की बारिश तो तुम्हें दिखाई दे गयी पर मेरे अंदर जो हर रोज बारिश होती है वो तुम कहां देख पा रही हो..इतने में उसने कहा कि तुम्हारे शहर में हूं...मिलोगे नहीं.. 


 कुछ देर बाद मैं बारिश में भींगते हुए उसके घर के पास वाले मॉल में था....वो वहां मेरा इंतजार कर रही थी..मैं पूरा भींग चुका था... मैं कुछ बोलता इससे पहले उसने कहा कि कल मुझे जाना है और मैं तुमसे मिले बिना यहां से चली जाऊं ऐसा नहीं हो सकता है...तुमसे कई सारे सवाल करने हैं. बारिश में तुम्हारे बाल भी हल्क भीगे हुए थे, तुम बहुत सुंदर लग रहे थे. मैने कहा सवाल पूछो... उसने कहा इतने दिन कैसे रहे मेरे बिना...तुम्हे मेरे से बात करने का मेरी आवाज सुनने का मन नहीं करता था...मैने कुछ नहीं कहा, उसने कहा बहुत मिस करती हूं तुम्हे आज भी..


इसलिए तुमसे मिलने के लिए खुद को रोक नहीं पायी. जमाना कुछ भी कहे तुम हमेशा मेरे रहोगे..यह अलग बात है कि हमदोनों ने अलग रास्ते अपने लिए चुने पर आज लगता है कि तुम्हारे बिना मैं एक कदम नहीं चल सकती थी, पर पूरी जिंदगी जीने के लिए निकल गयी. पर तुमने एक बार भी नहीं रोका. एक बार तो आवाज दिये होते....तुम्हारे आवाज के इंतजार में मैं आगे बढ़ते-बढ़ते इतनी दूर कब निकल गयी पता ही नहीं चला..अब मैं जा रही हूं. मौका मिलेगा तो फिर फोन करूंगी...वो चली गयी और मैं उसी  समंदर की बारिश में भीगता  हुआ सड़क पर जा रहा था. 


Saturday, 29 December 2018

रिश्ता तो हमदोनो के बीच कब का खत्म हो चुका है



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जानते हो आज तुम्हारी बहुत याद आ रही है... रात के लगभग एक बज रहे हैं, आंखों में नींद नहीं है. जबकि दिन भर ऑफिस में काम करते हुए यह सोच रहा था कि आज घर जाकर जल्दी सो जाऊंगा. पर शायद भूल गया था कि अब चैन की नींद कहां है. घर पहुंचा तो वही रोज की खिटपिट थी. शादी के डेढ़ साल के अंदर रिश्ता तलाक तक पहुंच जायेगा यह कभी सोचा नहीं था. मुझे तो लगता है बस अब कागजी कार्रवाई बाकी रह गयी है. रिश्ता तो हमदोनो के बीच कब का खत्म हो चुका है. 


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कभी कभी तो मन करता है भाग जाऊं कहीं दूर, ताकि एक पल के लिए थोड़ा सुकून के साथ रह सकूं. पर मां को देखकर हर बार कदम रुक जाते हैं. मां अक्सर यह कहती है बेटा मेरी वजह से तुम्हारी जिंदगी खराब हो गयी.  हां खराब हो गयी है मेरी जिंदगी... अब लगता है काश सिर्फ तुम होते तो कितना अच्छा होता. 





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मैं आगे नहीं बढ़ता पर घरवालों की खुशी के लिए मैंने अपनी जिंदगी दांव पर लगा दी. आज रात भी वही हो रहा है, बीवी की जुबान चल रही है. वही पुरानी बात, तुम्हारी मां खराब, तुम्हारी बहन खराब, मेरे लिए समय नहीं है, पैसा नहीं है.आज रात सच में तकलीफ हुई. लगा बहुत लंबा वक्त ले लिया एक फैसला करने में कि अब नहीं, साथ में रहना मुश्किल है मैं तलाक लेना चाहता हूं.  

Friday, 9 November 2018

काफी इंतजार के बाद तुम जब पहली बार छत पर दिया लेकर आये तो लग रहा मानो एक साथ कई चांद सारे आसमां में निकल गये हो

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दीपावली का दिन है. दिन भर अपने कमरे को साफ करने में और मां के बताये पूजा के सामान लाने मेें बीत गया. अखबार के दफ्तर से छुट्टी मिली थी. दिन भर सोने का मन था लेकिन मां ने छुट्टी का दिन का पूरा वसूल लिया. अपने रूम की सफाई करते हुए एक पुरानी डायरी हाथ लग गयी. काफी दिनों से मैं इसे खोज रहा था, आज जाकर मिली है कमबख्त. जानते हो तुम्हारे जाने के बाद यही डायरी मेरा सहारा है. इस डायरी से कई यादें जुड़ी हुई है. तुमने ही मुझे मेरे जन्मदिन पर यह डायरी मुझे गिफ्ट की थी और मैं अपनी रचनाएं इस डायरी में लिखकर तुम्हें पढ़ने के लिए देता था और तुम हर बार मेरी लिखी कविता, गीत और गजल के नीचे मुझे चिढ़ाने के लिए अपना रिमार्क लिखती थी, मुझे पसंद नहीं आया और अच्छा लिखो. फिर बाद में बोलती थी बहुत अच्छा तो वो तो तुम्हें चिढ़ाने के लिए लिखा था. 


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पता है ऐसा क्यों था,क्योंकि तुम्हें  मालूम था कि मेरी हर रचना सिर्फ तुम्हारे लिए थी, उनमें सिर्फ थे....आज भी सिर्फ तुम हो. डायरी के पन्ने पलट रहा था और पुरानी यादों में डूब रहा था. मुझे याद है दीपावली की ही रात थी जब पहली बार तुमने पहली बार अपने प्यार का इजहार किया था. पर उससे पहले मैं बहुत डरा हुआ था, क्योंकि जब तुम्हें पहली बार मेरे प्यार के बारे में जानकारी मिली थी, तुमने मेरे दोस्त को बुलाकर बहुत धमकी थी...पर मैं भी हारने वाला नहीं था और तुम्हारे पीछे लगा रहा. तुम्हारे बस के आगे पीछे जाना, लंच में तुम्हारे साथ-साथ...नहीं तुम्हारे पीछे पीछे पानी पीने जाता था...जिसके बाद शायद मेरा डेडिकेशन देख कर तुम पिघल गये और अपनी सहेली के जरिये मुझे मैसेज कराया था कि दीपावली की रात वो छत पर मेरा इंतजार करेगी. 


मुझे याद है उस दिन कैसे बेचैनी में मेरा दिन बीता था. पूरा दिन शाम होने के इंतजार में बीता था. जिसके बाद आखिरकार दिन ढल गया था, पर मैं शाम से पहले से ही अपने घर के छत पर तुम्हारा इंतजार कर रहा था. काफी इंतजार के बाद तुम जब पहली बार छत पर दिया लेकर आये तो लग रहा मानो एक साथ कई चांद सरे आसमां में निकल गये हो, ये तुम्हारा प्यार था या नहीं पर यकीन मानो ऐसा लगा कि मैं जिस रोशनी की खोज बचपन से लेकर अभी तक की दिवाली में कर रहा था वो आज मुझे दिखा था, महसूस किया था. 

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जानती हो वो मेरी पहली और आखिरी सबसे अच्छी दिवाली थी. क्योंकि उस दीवाली के बाद मेरी जिंदगी में जो अंधेरा हावी हुआ, उसे दूर करते-करते अब मैं थक चुका हूं. आज फिर दीपावली की शाम है. पूरे मुहल्ले में रौनक है. घर में रौनक है, लेकिन मेरे मन के कोने में अभी भी वो अंधेरा बसा हुआ है. जिसे सिर्फ तुम भर सकती हो. फिर से शाम हो गयी है और मैं बुझे हुए मन से दिया जलाने के लिए छत के ऊपर आया हूं, हर दीपावली की तरह आज भी मुझे उम्मीद है कि तुम अपने छत पर आओगे. दीया रख कर मैं कुछ देर के लिए शहर में फैली रोशनी को देख रहा था इतने में तुम्हारे छत पर नजर पड़ी एक प्यारी सी बच्ची हाथ में फूलझड़ी लिये छत पर आकर खेलने लगी और पीछे से तुम हाथों में दिया लेकर छत पर रखने आयी थी. फिर मैं नीचे अपने कमरे में चला आया. नहीं पता की तुमने मेरी छत की ओर देखा भी या नही....पर मेरे जीवन का अंधेरा आज और गहरा गया..... 

Saturday, 13 October 2018

तुम्हारी आवाज में तल्खी थी. हलांकि हमारा रिश्ता बुरे दौर से गुजर रहा था... लेकिन तुम्हारा यह तल्ख अंदाज मुझे अटपटा सा लगा..


Pic by Pawan Kumar

दिसंबर की ठिठूरती शाम है, हवाओं में हड्डी कपां देने वाली सिहरन है. सोच तो रहा था कि शाम के वक्त घर में बैठकर मां के साथ बातें करूंगा, लेकिन तब ही तुम्हारा फोन आ गया. तुमने कहा कि शहर के पश्चिम में स्थित ऊंची पहाड़ी के पास स्थित रेस्त्रां के ऊपरे तल्ले पर तुम मेरा इंतजार कर रहे हो. तुम्हारी आवाज में तल्खी थी. हलांकि हमारा रिश्ता बुरे दौर से गुजर रहा था... लेकिन तुम्हारा यह तल्ख अंदाज मुझे अटपटा सा लगा. मैने तुंरत जैकेट पहना....मां ने हड़बड़ाते देख मुझे गलाबंद देते हुए पूछा इतनी जल्दबाजी में कहां जा रहे हो. जवाब में मैने कहा बस तुरंत आता हूं. मैने अपनी बाइक ली और पांच मिनट में मैं उस पहाड़ी के रास्ते पर था. शाम के चार बज रहे थे, जल्दबाजी में मैने हैंड ग्लॉव्स नहीं पहना था, सर्द हवाओं के कारण हाथ जकड़ा जा रहा था, पर पहुंचने की  जल्दी के चलते स्पीड कम नहीं हो रही थी... 

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तुम तो शाम करे वक्त घर से नहीं निकलती थी, शादी के बाद तो बिल्कुल नहीं पर आज अचानक क्या हो गया तुम्हें, मन में कई तरह के ख्याल आ  रहे थे. इसी उधेड़बुन के बीच में कब ऊंची पहाड़ी वाला रेस्त्रां पहुंच गया, बाइक पार्क की और सीधा ऊपर छत पर चला गया. तुम सबसे किनारे वाली उसी कुर्सी पर बैठी थी, जहां से पूरा शहर दूर-दूर तक दिखाई पड़ता था. सूरज दिन की अपने अंतिम यात्रा पर था, सर्द शाम में उसकी लालिमा तुम्हारे सिंदूर की तरह लाल दिख रही थी....हां मगर वो सिंदूर मेरे नाम का नहीं था. तुम्हारी शादी के बाद भी हम दोनों अक्सर मिलते थे. पर आज तुम्हारा चेहरा खिला हुआ नहीं था. तुम्हारी नजरे कहीं और देख रही थी. मैं तम्हारे सामने वाली कुर्सी पर बैठ गया.....



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तुम आज बदले हुए दिख रहे थे. मै पूछने वाला था कि क्या हुआ, उससे पहले तुमने कहा अब हमदोनो के बीच कुछ रिश्ता नहीं है....तुम पहले भी इस तरही की बाते मजाक में करते थे...पर आज तुम्हारी आवाज में तल्खी थी...मैने पूछा क्या हुआ....तुम ऐसे कैसे कोई फैसला कर सकते हो. शाम के साथ तुम्हारी आवाज भी गहरी हो रही थी, ढलते सूरज का सूर्ख लाल रंग फीका धूंधला पर रहा था. रेस्त्रां के छत पर सिर्फ हमदोनों थे..और चारों ओर खामोशी थी....मैने कहा कि क्या यह तुम्हारा अंतिम फैसला है.. उसने फिर गुस्से में कहा हां.....तंग आ गयी हूं मै तुमसे....तुम मेरे लायक नहीं हो....पता नहीं मैने तुमसे क्यों प्यार किया....आज के बाद मेरे ख्याल में भी मत आना.....एक सांस में तुम सब कुछ कह गये.....तुम उठे और जाने लगे...मैने कहा चलो मैं छोड़ देता हूं....कम से कम आखिरी बार तो इस पहाड़ी रास्ते पर एक साथ चले....



मेरी बाइक धीरे-धीरे ढलान से उतर  रही थी.... मेरे गालो से मेरा सब्र नीचे उतर रहा था....तुम्हारा घर पास आ रहा था....मै तुमसे दूर जा रहा था....वो चुपचाप मेरे पीछे बैठी हुई थी....फिर उसने कहा....सुनो मेरा इंतजार मत करना...मैने कहा मैं करूंगा....उसने कहा कब तक....दशकों का तजुर्बा तुम्हारे चेहरे पर दिखाई देने लगे तब भी मैं सिर्फ तुम्हारा इंतजार करूंगा....इस उम्मीद में कि कम से कम एक दिन तुम्हारे साथ तुम्हारा होकर जी सकूं....आज कई बरस बीत चुके हैं.....मुझे उम्मीद है तुम जरूर आओगे....मेरी आखिरी ख्वाहिश पूरी करने के लिए......

Friday, 5 October 2018

हीरादह धाम: यहां आकर आप एक चीज जरूर सीखेंगे की जीवन में कितनी भी कठिनाई हो निरंतर प्रयास से आप जरूर आगे बढ़ सकते हैं.

Pic by Pawan


जीवन में कठिनाइयों के बीच पत्थर को चीर कर आगे बढ़ने का गुण सिखाती  शंख नदी
नदी अपना रास्ता खुद बना लेती है और अगर कोई उसकी तेज धार के बीच में आता है तो वह उसे तहस-नहस करके आगे बढ़ जाती है. गुमला जिले के रायडीह प्रखंड स्थित हीरादह धाम इस बात की तस्दीक करता है. हीरादह धाम एक दर्शनीय स्थल होने के साथ-साथ एक धार्मिक स्थल भी है. यहां पर भगवान भास्कर का मंदिर बना हुआ है और भगवान जगन्नाथ का भी छोटा सा मंदिर है. हीरादह में लगे हुए साइन बोर्ड के अनुसार इस श्री हिंदू धर्म रक्षा उपकेंद्र की स्थापना 1951 में हुई थी.  यह श्री 1008 श्री रामरेखा धाम सिमडेगा से जुड़ा हुआ है. हीरादह धाम शंख नदी की तट पर स्थित है.
Pic by Pawan Kumar

Pawan Kumar

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शंख नदी यहां पर पूरे वेग के साथ बहती है. मंदिर के पीछे बीच नदी पर मौजूद चट्टान का चिकना पहाड़ इसका प्रमाण है. यहां फुटबॉल ग्राउंड जितना बड़ा चट्टान का मैदान है, जो बिल्कुल समतल है. पानी के बहाव के कारण यह चिकना और समतल हो गया है. जिसके कारण अपने आप में अनोखा प्रतीत होता है. इतना ही नहीं पानी के तेज घुमाव के कारण बीच चट्टान पर छोटे- बडे कुंड बने हुए हैं, जो इस बात की गवाही देने के लिए काफी है की शंख नदी और नदी के रास्ते में पड़ने वाले चट्टान का संघर्ष सदियों पुराना है. चट्टान में बने कुंड 10 फीट तक गहरे हैं और उनमें पानी भरा हुआ है. उन कुंड में घुसने के मनाही है क्योंकि यह जानलेवा साबित हो सकता है. अंदर में और फिसलन हो सकती है,ओर उसके अंदर गुफानुमा छेद भी हो सकता है जिससे पानी अंदर घुसता है और बाहर निकलता है. देखने में यह कुंड बेहद ही खूबसूरत दिखाई देता है और पिकनिक स्पॉट की तरह है. 

Pawan Kumar

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हीरादाह धाम के आस-पास भी प्रकृति ने असीम सुंदरता बिखेरी है. नदी के दोनो ओर स्थित उचें पहाड़ और घने जंगल इसकी खूबसूरती में चार चांद लगाते हैं. शंख नदी छोटा नागपुर पठार के पश्चिमी छोर में उत्तरी कोयल के विपरीत प्रवाहित होती है. यह गुमला जिला के रायडीह के दक्षिण से प्रारम्भ होती है. उद्गम स्थल के आरंभ में यह नदी काफी संकरी एवं गहरी खाई का निर्माण करती है. अपने प्रवाह मार्ग में यह राजाडेरा के पास 200 फीट ऊंचा जल प्रपात बनाती है, जो सदनी घाघ जल प्रपात के नाम से जाना जाता है.

Pawan Kumar

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अगर आप झारखंड की प्राकृतिक सुंदरता को देखना चाहते हैं तो हीरादह धाम आपके लिए बेहतर विकल्प हो सकता है जिसे अभी तक बहुत कम लोगों ने ही एक्सपेलोर किया है. यहां आने के लिए दिन भर का समय लेकर चलना होगा. रांची से ढाई घंटे के सफर के बाद आप यहां पहुंच सकते हैं. रांची गुमला आने के बाद आपको गुमला के मांझाटोली से बायें मुड़ना पड़ता है. बायें मुड़कर आगे जाने के बाद रायडीह गांव से आगे जाने के बाद रमजा गांव पहुंचा जाता है. रमजा गांव के अंदर घुसकर रास्ते से आप सीधा हीरादह धाम पहुंच सकते हैं. खाने-पीने का इंतजाम आप खुद कर ले और यह सुनिश्चित कर ले की आपके वाहन में तेल खत्म नहीं होगा और चारों टायर अच्छे कंडीशन में हैं. 14 जनवरी को यहां मकर संक्राति के अवसर पर विशाल मेला लगता है. यहां आकर आप एक चीज जरूर सीखेंगे की जीवन में कितनी भी कठिनाई हो निरंतर प्रयास से आप जरूर आगे बढ़ सकते हैं.